शतनाम · माँ सीता (जानकी)

श्रीसीताष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

माँ सीता (जानकी) के एक सौ आठ नामों का स्तोत्र। आनन्द रामायण में महर्षि अगस्त्य ने सुतीक्ष्ण मुनि को सीता-कवच के बाद यह स्तोत्र सुनाया। विनियोग, करन्यास, अङ्गन्यास और ध्यान सहित।

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र17 श्लोकविनियोग · न्यास · ध्यान · फलश्रुति

पाठ से पहले — «ॐ» के विषय में

परम्परा के अनुसार «ॐ» (प्रणव) का उच्चारण यज्ञोपवीत संस्कार के बाद किया जाता है। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है, वे पाठ में आए «ॐ» को छोड़कर, या उसके स्थान पर «नमः» कहकर पाठ आगे करते रहें — भाव और श्रद्धा से किया गया पाठ पूर्ण है।

आपका चुनाव इस फ़ोन में याद रहता है; पूरे पाठ में «ॐ» उसी के अनुसार दिखेगा।

यज्ञोपवीत संस्कार — न्यूनतम, श्रेष्ठ और अधिकतम आयु
वर्णन्यूनतम आयुश्रेष्ठ आयुअधिकतम आयु
ब्राह्मण5वाँ वर्ष8वाँ वर्ष16 वर्ष
क्षत्रिय6ठा वर्ष11वाँ वर्ष22 वर्ष
वैश्य8वाँ वर्ष12वाँ वर्ष24 वर्ष

(आयु की गणना गर्भ से की जाती है।)

न्यूनतम आयु — मनुस्मृति 2.37

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥

अर्थ: ब्रह्मतेज की इच्छा हो तो ब्राह्मण का 5वें वर्ष में, बल की इच्छा हो तो क्षत्रिय का 6ठे वर्ष में और धन-समृद्धि की इच्छा हो तो वैश्य का 8वें वर्ष में उपनयन करें।

श्रेष्ठ आयु — मनुस्मृति 2.36

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से 8वें वर्ष में, क्षत्रिय का 11वें वर्ष में और वैश्य का 12वें वर्ष में करना चाहिए।

अधिकतम आयु — मनुस्मृति 2.38

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण के लिए 16 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 22 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष तक सावित्री का काल नहीं बीतता।

मनुस्मृति 2.39

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥

अर्थ: अधिकतम आयु के बाद भी जिनका संस्कार नहीं हुआ, वे सावित्री-पतित (व्रात्य) हो जाते हैं। उनके लिए प्रायश्चित्त (व्रात्य-स्तोम) करके ही उपनयन का विधान है।

(पारस्कर गृह्यसूत्र 2.5 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.37 में भी यही आयु-सीमाएँ बताई गई हैं।)

🙏 अपने बालक का यज्ञोपवीत संस्कार समय रहते कराएँ।

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पूर्वभाग

अगस्तिरुवाच

एवं सुतीष्ण सीतायाः कवचं ते मयेरितम् ।
अतः परं शृणुष्वान्यत् सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ १॥

यस्मिन्नष्टोत्तरशतं सीतानामानि सन्ति हि ।
अष्टोत्तरशतं सीतानाम्नां स्तोत्रमनुत्तमम् ॥ २॥

ये पठन्ति नरास्त्वत्र तेषां च सफलो भवः ।
ते धन्या मानवा लोके ते वैकुण्ठं व्रजन्ति हि ॥ ३॥

विनियोग

अस्य श्रीसीतानामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य अगस्त्य ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
रमेति बीजम् ।
मातुलिङ्गीति शक्तिः ।
पद्माक्षजेति कीलकम् ।
अवनिजेत्यस्त्रम् ।
जनकजेति कवचम् ।
मूलकासुरमर्दिनीति परमो मन्त्रः ।
श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थं सकलकामनासिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।

करन्यास

ॐ सीतायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रमायै तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ मातुलिङ्ग्यै मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ पद्माक्षजायै अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ अवनिजायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ जनकजायै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

षडङ्गन्यास — अङ्गन्यास

ॐ सीतायै हृदयाय नमः ।
ॐ रमायै शिरसे स्वाहा ।
ॐ मातुलिङ्ग्यै शिखायै वषट् ।
ॐ पद्माक्षजायै नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ जनकात्मजायै अस्त्राय फट् ।
ॐ मूलकासुरमर्दिन्यै इति दिग्बन्धः ।

ध्यान

वामाङ्गे रघुनायकस्य रुचिरे या संस्थिता शोभना
या विप्राधिप यान रम्य नयना या विप्रपालानना ।
विद्युत्पुञ्ज विराजमान वसना भक्तार्ति सङ्खण्डना
श्रीमद् राघव पादपद्मयुगल न्यस्तेक्षणा सावतु ॥

स्तोत्र — अष्टोत्तरशतनाम

श्री सीता जानकी देवी वैदेही राघवप्रिया ।
रमावनिसुता रामा राक्षसान्त प्रकारिणी ॥ १॥

रत्नगुप्ता मातुलिङ्गी मैथिली भक्ततोषदा ।
पद्माक्षजा कञ्जनेत्रा स्मितास्या नूपुरस्वना ॥ २॥

वैकुण्ठनिलया मा श्रीः मुक्तिदा कामपूरणी ।
नृपात्मजा हेमवर्णा मृदुलाङ्गी सुभाषिणी ॥ ३॥

कुशाम्बिका दिव्यदा च लवमाता मनोहरा ।
हनूमद् वन्दितपदा मुग्धा केयूर धारिणी ॥ ४॥

अशोकवन मध्यस्था रावणादिग मोहिनी ।
विमानसंस्थिता सुभ्रू सुकेशी रशनान्विता ॥ ५॥

रजोरूपा सत्त्वरूपा तामसी वह्निवासिनी ।
हेममृगासक्त चित्ता वाल्मीकाश्रम वासिनी ॥ ६॥

पतिव्रता महामाया पीतकौशेय वासिनी ।
मृगनेत्रा च बिम्बोष्ठी धनुर्विद्या विशारदा ॥ ७॥

सौम्यरूपा दशरथस्नुषा चामर वीजिता ।
सुमेधा दुहिता दिव्यरूपा त्रैलोक्यपालिनी ॥ ८॥

अन्नपूर्णा महालक्ष्मीः धीर्लज्जा च सरस्वती ।
शान्तिः पुष्टिः शमा गौरी प्रभायोध्या निवासिनी ॥ ९॥

वसन्तशीलता गौरी स्नान सन्तुष्ट मानसा ।
रमानाम भद्रसंस्था हेमकुम्भ पयोधरा ॥ १०॥

सुरार्चिता धृतिः कान्तिः स्मृतिर्मेधा विभावरी ।
लघूदरा वरारोहा हेमकङ्कण मण्डिता ॥ ११॥

द्विज पत्न्यर्पित निजभूषा राघव तोषिणी ।
श्रीराम सेवन रता रत्न ताटङ्क धारिणी ॥ १२॥

रामावामाङ्ग संस्था च रामचन्द्रैक रञ्जिनी ।
सरयूजल सङ्क्रीडा कारिणी राममोहिनी ॥ १३॥

सुवर्ण तुलिता पुण्या पुण्यकीर्तिः कलावती ।
कलकण्ठा कम्बुकण्ठा रम्भोरूर्गजगामिनी ॥ १४॥

रामार्पितमना रामवन्दिता रामवल्लभा ।
श्रीरामपद चिह्नाङ्गा राम रामेति भाषिणी ॥ १५॥

रामपर्यङ्क शयना रामाङ्घ्रि क्षालिनी वरा ।
कामधेन्वन्न सन्तुष्टा मातुलिङ्ग कराधृता ॥ १६॥

दिव्यचन्दन संस्था श्री मूलकासुर मर्दिनी ।
एवं अष्टोत्तरशतं सीतानाम्नां सुपुण्यदम् ॥ १७॥

फलश्रुति

ये पठन्ति नरा भूम्यां ते धन्याः स्वर्गगामिनः ।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतायाः स्तोत्रमुत्तमम् ॥ १८॥

जपनीयं प्रयत्नेन सर्वदा भक्तिपूर्वकम् ।
सन्ति स्तोत्राण्यनेकानि पुण्यदानि महान्ति च ॥ १९॥

नानेन सदृशानीह तानि सर्वाणि भूसुर ।
स्तोत्राणामुत्तमं चेदं भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥ २०॥

एवं सुतीष्ण ते प्रोक्तं अष्टोत्तरशतं शुभम् ।
सीतानाम्नां पुण्यदं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम् ॥ २१॥

नरैः प्रातः समुत्थाय पठितव्यं प्रयत्नतः ।
सीतापूजनकालेऽपि सर्ववाञ्छितदायकम् ॥ २२॥

॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे सीताष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

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