आरती · माँ दुर्गा (अम्बे)

जय अम्बे गौरी — माँ दुर्गा की आरती

नवरात्रि और देवी-पूजा में सबसे अधिक गाई जाने वाली माँ अम्बे की आरती।

आरती13 पदविशेष: शुक्रवार, नवरात्रि, अष्टमी

आरती

दीप जलाइए, आरती गाइए

«आरती आरम्भ करें» दबाने पर थाली घूमने लगती है और हर कुछ क्षण में घण्टी बजती है — आप साथ में आरती गाइए। चाहें तो केवल घण्टी भी बजा सकते हैं।

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आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

भावार्थहे अम्बे गौरी, श्यामा गौरी माँ! आपकी जय हो; विष्णु, ब्रह्मा और शिव दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

माँग सिन्दूर विराजत, टीको को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

भावार्थआपकी माँग में सिन्दूर और माथे पर कस्तूरी का टीका है; दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं और मुख चन्द्रमा जैसा सुन्दर है।

कनक समान , राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥

भावार्थआपका शरीर सोने जैसा है, लाल वस्त्र सुशोभित हैं; गले में लाल फूलों की माला है।

वाहन राजत, धारी।
नर मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

भावार्थआप सिंह पर विराजती हैं, खड्ग और खप्पर धारण करती हैं; देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं और आप उनके दुःख हरती हैं।

कुण्डल शोभित, मोती।
कोटिक चन्द्र , सम राजत ज्योती॥

भावार्थकानों में कुण्डल और नाक में मोती शोभित है; आपकी ज्योति करोड़ों चन्द्रमा और सूर्यों के समान है।

शुम्भ निशुम्भ , महिषासुर ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥

भावार्थआपने शुम्भ-निशुम्भ को नष्ट किया और महिषासुर का वध किया; आपके नेत्र धूम्र-वर्ण और सदा दिव्य मद से भरे हैं (कुछ विद्वान इसमें धूम्रलोचन-वध का संकेत मानते हैं)।

चण्ड मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, भयहीन करे॥

भावार्थआपने चण्ड-मुण्ड का संहार किया, रक्तबीज को समाप्त किया, मधु-कैटभ को मारा और देवताओं को निर्भय किया।

ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम बखानी, तुम शिव ॥

भावार्थआप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) हैं; शास्त्र आपका वर्णन करते हैं — आप शिवजी की पटरानी हैं।

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥

भावार्थचौंसठ योगिनियाँ आपका गुणगान करती हैं, भैरव नृत्य करते हैं; ताल, मृदंग और डमरू बजते हैं।

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति करता॥

भावार्थआप ही जगत की माता और पालनहार हैं; भक्तों के दुःख हरती हैं और सुख-सम्पत्ति देती हैं।

भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥

भावार्थआपकी चार भुजाएँ अत्यन्त शोभित हैं, आप वर-मुद्रा धारण करती हैं; आपकी सेवा करने वाले नर-नारी मनचाहा फल पाते हैं।

थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥

भावार्थसोने के थाल में अगर और कपूर की बाती जल रही है; (मालकेतु पर्वत पर) आपकी ज्योति करोड़ों रत्नों जैसी चमकती है।

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पति पावै॥

भावार्थस्वामी शिवानन्द कहते हैं — जो माँ अम्बे की यह आरती गाता है, वह सुख और सम्पत्ति पाता है।

॥ इति ॥

आरती सम्पन्न हुई। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

पाठ शान्त मन और स्पष्ट उच्चारण से करें; भावार्थ समझकर पढ़ने से मन अधिक लगता है। पाठ में आई फलश्रुति कवि की श्रद्धा और परम्परा की आस्था है — इसे किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में न लें।

भावार्थ सरल हिन्दी में, अर्थ समझाने के लिए है।

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