डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा

वंश परम्परा

सात पीढ़ियाँ — शास्त्र, ग्रन्थ-लेखन और ज्योतिष

एक परिवार  •  सात पीढ़ियाँ  •  अनवरत शास्त्र-साधना

पं. विजयदेव जी से डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा तक।

भारत में विद्या कभी अकेले नहीं चलती। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उतरती है — पढ़ाई से भी अधिक आचरण से, और उपदेश से भी अधिक उस दिनचर्या से जो घर में चलती रहती है।

जिस घर में सात पीढ़ियों से शास्त्र पढ़े और लिखे गए हों, वहाँ ज्ञान विषय नहीं रहता — वातावरण बन जाता है। बालक सुनते-सुनते सीखता है। यही परम्परा का वास्तविक अर्थ है।

वंश-क्रम

पीढ़ी-दर-पीढ़ी

  1. १

    पं. विजयदेव जी

    वंश-परम्परागत वैदिक साहित्य का अवलोकन; ब्राह्मणत्व-रक्षा हेतु तप।

  2. २

    पं. जवाहरलाल जी

    भगवान शंकर के चरित्र से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों की रचना; इनमें “मार्कण्डेयचरित” सर्वश्रेष्ठ।

  3. ३

    पं. भगीरथ जी

    शिव-आराधना से चार पुत्र — जीवाराम, काशीराम, आशाराम, टीकाराम।

  4. ४

    पं. काशीराम जी

  5. ५

    पं. परमानन्द जी

  6. ६

    पं. होमनिधि जी

    ज्योतिषाचार्य।

  7. ७

    डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा (पाठक)

    व्याकरणाचार्य, पीएच.डी. (संस्कृत व्याकरण) · ज्योतिष · “पितृ-कर्म श्राद्ध-मीमांसा” के लेखक।

वंशावली

पूरा वंश-वृक्ष

ऊपर की सूची सीधी वंश-पंक्ति है। यहाँ वही परिवार पूरा दिखता है — भाई, बहन और आगे की पीढ़ियाँ भी।

  • पं. विजयदेव जी
    • पं. जवाहरलाल जी
      • पं. भगीरथ जी चार पुत्र
        • पं. जीवाराम जी
        • पं. काशीराम जी
          • पं. परमानन्द जी
            • पं. रामस्वरूप जीज्येष्ठ
            • पं. होमनिधि जीमध्यम · ज्योतिषाचार्य
              • पं. धर्मेन्द्र पाठक
              • डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा (पाठक) व्याकरणाचार्य · पी-एच.डी.
              • पं. सत्येन्द्र पाठक
            • पं. चन्द्रहंस जीअन्तिम
        • पं. आशाराम जी
        • पं. टीकाराम जी पत्नी — श्रीमती सुबुद्धि देवी
          • पं. अखिलानन्द शर्मा जीज्येष्ठ
            • पं. यज्ञेश जी
              • विनोद
                • मनीष
            • पं. मुनीश्वर जी
            • पं. नरेश जी
          • श्रीमती शान्ति देवी
          • पं. सुबोधचन्द्र जी

इस वृक्ष में वही नाम हैं जो ग्रन्थ के संस्कृत श्लोकों और गद्य में स्पष्ट रूप से लिखे हैं। मूल वंशावली-पत्र में कुछ और नाम भी अंकित हैं; वे यहाँ तब जोड़े जाएँगे जब उनका पाठ निश्चित रूप से पढ़ा जा सके।

परिवार

परिवार की विभूतियाँ

ये दोनों सीधी वंश-पंक्ति में नहीं हैं, पर इसी कुल के हैं।

पं. टीकाराम जी

पं. भगीरथ जी के कनिष्ठ पुत्र, पं. काशीराम जी के भाई

पाणिनीय व्याकरण, महाभाष्य, वेदान्त, न्याय और निरुक्त के विद्वान। मथुरा, काशी और शान्तिपुर (नवद्वीप) में अध्ययन। पूना में शास्त्रार्थ-विजय। कर्णवास में गंगा-तट पर वि.सं. 1958 में देहावसान।

पं. अखिलानन्द शर्मा जी

पं. टीकाराम जी के पुत्र; डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा के दादा पं. परमानन्द जी के चचेरे भाई

जन्म वि.सं. 1937, माघ शुक्ल तृतीया। 122 ग्रन्थ, एक लाख से अधिक पद्य। सनातन धर्म की रक्षा में 500 से अधिक शास्त्रार्थ।

विस्तार से

सनाढ्य वंश परम्परा

इस सनाढ्य वंश में कलि की वक्र गति से आई शिथिलता को दूर करने के लिए पं. श्री विजयदेव जी हुए। उन्होंने वंश-परम्परागत वैदिक साहित्य का अवलोकन करके ब्राह्मणत्व की रक्षा के लिए अनेक प्रकार का तप किया और अपने धर्म का पालन किया। यथासमय उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया और पं. श्री जवाहरलाल जी को पुत्र-रूप में प्राप्त किया।

येन जवाहरता पूर्वजकीर्तिं परैरभिख्याताम् ।
अन्वर्थमत्र लोके जवाहरेति स्वनाम समकारि ॥

भावार्थ — जिन्होंने पूर्वजों की कीर्ति को वेग से आगे ले जाकर संसार में अपना ‘जवाहर’ नाम सार्थक कर दिया।

पण्डित-समाज में उन्होंने कीर्ति को वेग से प्राप्त करके अपना नाम गुणों के अनुरूप बनाया। अपनी विद्या को सफल करने के लिए उन्होंने भगवान शंकर के चरित्र से सम्बन्ध रखने वाले अनेक ग्रन्थ रचे, जिनमें “मार्कण्डेयचरित” सबसे अच्छा था।

वंशपरम्परयाऽस्मिन्वंशे तेनापि वंशरत्नेन ।
अधिगत्य जन्म विद्या साफल्यमनायि शङ्करस्तवनैः ॥

भावार्थ — इस वंश में वंश-रत्न के रूप में जन्म लेकर उन्होंने शंकर-स्तवन के द्वारा अपनी विद्या को सफल किया।

शंकर भगवान के अनन्य भक्त पं. श्री जवाहरलाल जी ने कालक्रम से पं. श्री भगीरथ जी को जन्म दिया। भागीरथी के समान निर्मल अपनी कीर्ति को सर्वत्र फैलाकर उन्होंने अपने पूर्वजों से भी अधिक मान प्राप्त किया।

गङ्गामिव भूमितले सितां स्वकीर्तिं परम्परामेषः ।
विस्तार्य सद्गुणौघैराह्लादितवान्पुरातनख्यातिम् ॥

भावार्थ — भूमि पर गंगा के समान उज्ज्वल अपनी कीर्ति-परम्परा को फैलाकर उन्होंने सद्गुणों के समूह से पुरानी ख्याति को और प्रफुल्लित किया।

पं. भगीरथ जी ने भगवान शंकर की आराधना करके वर-लाभ प्राप्त किया, जिसके प्रतिफल में उनके यहाँ चार पुत्रों ने जन्म लिया।

अस्याभवन्नमन्दप्रतिभासम्पन्ननिर्मलस्वान्ताः ।
चत्वारस्ते तनया नयावनद्धस्य लोकविख्याताः ॥

भावार्थ — तीव्र प्रतिभा और निर्मल अन्तःकरण वाले उनके चार पुत्र हुए, जो लोक में विख्यात हुए।

वे चार पुत्र थे — जीवाराम, काशीराम, आशाराम और टीकाराम। इनमें सबसे अन्तिम पं. टीकाराम जी हुए। सीधी वंश-पंक्ति काशीराम जी से आगे चली — उनके पुत्र पं. परमानन्द जी, उनके पुत्र पं. होमनिधि जी ज्योतिषाचार्य, और उनके पुत्र डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा (पाठक)।

पं. टीकाराम जी

माहाभाग्याज्जगतां समुद्भवं प्राप्य यः सनाढ्यकुले ।
वर्णानवर्णमुख्यान्बाल्ये समये दधार शेमुष्याम् ॥

भावार्थ — जगत् के महान् सौभाग्य से सनाढ्य कुल में जन्म लेकर उन्होंने बाल्यकाल में ही वर्णों को अपनी बुद्धि में धारण किया।

बाल्यकाल बीतने पर कुल-रीति के अनुसार उनका उपनयन संस्कार हुआ। वंश-परम्परागत आचार्य से ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेकर, मौञ्जी, मेखला, मृगचर्म, पलाश-दण्ड और कमण्डलु लेकर उन्होंने गुरु के गृह का मार्ग लिया।

संस्कारोत्तरकालं गुरोरनुज्ञां शिरस्यवस्थाप्य ।
यः पाणिनीयशास्त्रं समग्रमध्यैष्ट विस्तृतप्रज्ञः ॥

भावार्थ — संस्कार के पश्चात् गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके, विस्तृत प्रज्ञा वाले उन्होंने सम्पूर्ण पाणिनीय शास्त्र का अध्ययन किया।

सबसे पहले उन्होंने पाणिनीय व्याकरण पढ़ा। इसके बाद मथुरा जाकर गुरुवर पं. युगलकिशोर जी से — जो निम्बार्क-सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य थे — महाभाष्य का अध्ययन किया। फिर काशी जाकर विश्वरूप स्वामी जी से वेदान्त पढ़ा, और नवद्वीप के शान्तिपुर में श्री तारानाथ तर्कवाचस्पति से नव्य तथा प्राचीन — दोनों प्रकार के न्यायशास्त्र का अध्ययन किया। वेदांगों का अध्ययन पूरा करके वैदिक साहित्य में प्रवेश के लिए उन्होंने यास्कीय निरुक्त पढ़ा। पिंगल-छन्दःसूत्र तथा काव्यालंकार-सूत्र आदि प्राचीन आर्ष ग्रन्थों को सर्वानुक्रम सहित उन्होंने काशी में पढ़ा। तदनन्तर वेदों का स्वाध्याय आरम्भ किया।

शब्दस्तोमात्मक वैदिक तत्त्व का रहस्य प्राप्त करके उन्होंने भारतवर्ष में मुनि-वृत्ति से जीवन बिताना स्वीकार किया। कौपीन-मात्र वस्त्र और भिक्षा से प्राप्त भोजन में सन्तुष्ट रहकर उन्होंने प्रायः गंगा-तट पर जीवन व्यतीत किया। अपरिग्रह-व्रत के पालन में दत्तचित्त रहकर केवल ब्राह्मणों से प्राप्त अन्न से निर्वाह किया। ब्राह्मणों के लिए गो-पालन आवश्यक समझकर सदा अपने पास एक गौ रखी, जिसका वे प्रातःकाल उठते ही पूजन करते थे। नगरों में रहने से मनोवृत्ति रोकना कठिन समझकर उन्होंने वृक्षों के नीचे रहकर जीवन बिताना स्वीकार किया।

आगत सज्जनों से प्राप्त सम्पत्ति को दीन जनों में बाँटकर उन्होंने उसे सार्थक किया। प्रयाग में नेपाल-नरेश से प्राप्त हुई सम्पत्ति भी उन्होंने तुरन्त ब्राह्मणों में बाँट दी। उनके घर में जन्म लेने वालों की मातृभाषा देववाणी हो — यह मानकर उन्होंने सदा संस्कृत में ही सम्भाषण करना स्वीकार किया। देशाटन की इच्छा से मरुदेश में जाकर, जहाँ कूप का जल भी दुर्लभ था, उन्होंने स्नान आदि समस्त व्यवहार गंगाजल से ही किया। वेदमन्त्रों द्वारा प्रतिपादित और वेदान्त-दर्शन से अनुमोदित अद्वैत-तत्त्व का ही उन्होंने सर्वत्र प्रचार किया।

यः पुण्यपत्तनस्थं विद्वद्वृन्दं विजित्य सद्वादे ।
तत्रत्यमानवानां मनांसि जग्राह सच्चरित्रेण ॥

भावार्थ — पुण्यपत्तन (पूना) के विद्वत्-समूह को शास्त्रार्थ में जीतकर उन्होंने वहाँ के लोगों के मन को अपने सच्चरित्र से जीत लिया।

पूना में उनसे इस विषय पर बड़े मार्के का शास्त्रार्थ हुआ था कि ब्राह्मणत्व देश-परक है या नहीं। मुम्बई में श्री गोकुलदास के यहाँ तीन दिन रहकर उन्होंने पं. गट्टूलाल जी महाराज के द्वारा विस्तृत कीर्ति प्राप्त की। उनका विवाह सिकन्दराबाद-निवासी पं. तुलसीराम जी की सुपुत्री, परम विदुषी श्रीमती सुबुद्धि देवी से हुआ।

गङ्गातटे मुहूर्ते ब्राह्मे मूर्धप्रदेशविवरेण ।
यल्लीलासंवरणं पुत्रस्याङ्के बभूव भाग्येन ॥

भावार्थ — गंगा के तट पर ब्राह्ममुहूर्त में, पुत्र की गोद में बैठकर, ब्रह्मरन्ध्र से उन्होंने अपनी लीला का संवरण किया।

कर्णवास में गंगा के तट पर, माघ शुक्ला एकादशी को ब्राह्ममुहूर्त में, ज्येष्ठ पुत्र की गोद में बैठकर उन्होंने देह त्याग किया। विक्रम संवत् 1958 में उनका देहावसान हुआ।

पं. अखिलानन्द शर्मा जी

ऋषिवह्निनन्दसोमैर्विरुद्धगत्या समन्विते वर्षे ।
मज्जन्म चन्द्रनगरे समभून्माघे सिते तृतीयायाम् ॥

भावार्थ — चन्द्रनगर में माघ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को उनका जन्म हुआ।

पं. टीकाराम जी और श्रीमती सुबुद्धि देवी अपने गाँव चन्द्रनगर जा रहे थे। अनूपशहर के समीप अवन्तिका देवी (आहार) के वन में, गंगा के निकट एक वृक्ष की छाया में, शुभ लग्न में माता सुबुद्धि ने शिशु को जन्म दिया — विक्रम संवत् 1937, माघ शुक्ला तृतीया, मंगलवार, शतभिषा नक्षत्र, परिघ योग, गर करण में। पति की आज्ञा मानकर वे आगे की यात्रा पर चल पड़ीं; तीसरे दिन लौटते समय ममता से विवश होकर वे उसी वृक्ष की ओर गईं। शिशु प्रफुल्लित होकर अपने पाँव के अँगूठे को हाथों से मुख तक ले जाकर किलकारी भर रहा था। पं. टीकाराम जी ने आकर देखा और कहा — इसका बाल भी बाँका कोई नहीं कर सकता; यह सनातन धर्म का उद्भट विद्वान् होगा।

एक वर्ष के होने पर पिता ने उन्हें काशी में विश्वनाथ जी का दर्शन कराया। तीन वर्ष के होने पर मुम्बई में पं. गट्टूलाल जी ने उन्हें “त्रिवार्षिकः पण्डितः” कहकर कवि होने का आशीर्वाद दिया। उनकी मातृभाषा संस्कृत थी। चार वर्ष की अवस्था में पिता ने भागीरथी के तट पर रेती में अँगुली से अक्षर लिखना सिखाया। पाँचवें वर्ष में गंगोत्तरी में पिता ने स्वयं उनका उपनयन संस्कार किया। इसके बाद कर्णवास में ज्येष्ठ पितृव्य पं. जीवाराम जी के पास व्याकरण और वेद पढ़ा; मथुरा में पं. युगलकिशोर जी से अष्टाध्यायी और महाभाष्य; अनूपशहर में पं. विष्णुदत्त जी से साहित्य। कुल-देवी अवन्तिका में जाकर उन्होंने मान्त्रिक और तान्त्रिक — दोनों दीक्षाएँ प्राप्त कीं। बाईस वर्ष की अवस्था में पिता का स्वर्गवास हुआ; पिता की आज्ञा-पालन के लिए उन्होंने तीन वर्ष और विद्याभ्यास किया।

नास्तिकतामुखमर्दनदक्षत्वान्नास्तिकग्रन्थान् ।
दृष्ट्वा तत्परिमर्दनमूला बहवो विनिर्मिता ग्रन्थाः ॥

भावार्थ — नास्तिक ग्रन्थों को देखकर, उनके खण्डन को मूल में रखकर उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की।

विजिताः परःसहस्रा नास्तिकवर्याः सनातनं धर्मम् ।
रक्षितुमेव न दर्पाद्दिक्कृतत्वं द्वन्द्वतरे न्यस्तम् ॥

भावार्थ — यह सब केवल सनातन धर्म की रक्षा के लिए किया गया, अभिमान से नहीं।

उनका विवाह अनूपशहर में पं. गंगाप्रसाद जी की सुपुत्री श्रीमती मालती देवी से हुआ। उन्होंने छोटे-बड़े 122 ग्रन्थ लिखे, जिनकी पद्य-संख्या एक लाख से अधिक है, और सनातन धर्म की रक्षा के लिए पाँच सौ से अधिक शास्त्रार्थ किए। पं. टीकाराम जी की सन्तानों में सबसे पहले अखिलानन्द जी हुए, उनके बाद बहन शान्ति देवी और छोटे भाई पं. सुबोधचन्द्र जी। पं. अखिलानन्द जी के तीन पुत्र हुए — यज्ञेश, मुनीश्वर और नरेश।

चन्द्रनगर (चंदुनगला), गुन्नौर, बदायूं

तच्चन्द्रनगरमस्मिँल्लोके धन्यं किमत्र वक्तव्यम् ।
यस्मिन्नसौ गुणाढ्यः सनाढ्यवर्यो जनिं शिवामापत् ॥

भावार्थ — वह चन्द्रनगर इस लोक में धन्य है — इसमें क्या कहना — जिसमें सनाढ्यों में गुणाढ्य उन श्रेष्ठ पुरुष ने मंगलमय जन्म पाया।

बदायूं जिले की गुन्नौर तहसील के इलाके में स्थित वह चन्द्रनगर — वर्तमान में चंदुनगला — अत्यन्त धन्यवाद के योग्य है, जिसकी पवित्र भूमि में इस कुल के महानुभावों ने जन्म लिया। यही वह ग्राम है जिससे इस वंश की परम्परा जुड़ी हुई है।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा

काशीराम विपश्चितोऽथ विमलो जातः सुतश्चाग्रणीः ।
वंशस्यास्य विभासकोऽपि परमानन्दाभिधः सन्मतिः ॥
तत्पुत्रा कुलदीपकाः समभवन् रामस्वरुपोऽग्रतः ।
श्रीमद् होमनिधिस्ततश्च सुमति श्री चन्द्रहंसाभिधः ॥

भावार्थ — विद्वान् काशीराम जी के विमल एवं अग्रगण्य पुत्र परमानन्द हुए, जिन्होंने इस वंश को प्रकाशित किया। उनके तीन कुल-दीपक पुत्र हुए — ज्येष्ठ रामस्वरूप, फिर श्रीमान् होमनिधि, और अन्तिम श्री चन्द्रहंस।

लोकप्राप्य विभूतिराजदखिलानन्दस्य शुद्धान्वये ।
श्रीमद् होमनिधेस्त्रयश्चतनया धर्मेन्द्र नामादिमः ॥
ज्ञानेन्द्रः सुरभारती रसलसद्भा भरैर्भ्राजितः ।
सत्येन्द्रश्च विचक्षणः सुरगिरामध्यापने तत्परः ॥

भावार्थ — पं. अखिलानन्द जी के शुद्ध वंश में श्री होमनिधि ज्योतिषाचार्य के तीन पुत्र हुए — प्रथम धर्मेन्द्र पाठक; द्वितीय ज्ञानेन्द्र शर्मा (पाठक), व्याकरणाचार्य, पी-एच.डी., जो संस्कृत की रस-प्रभा से सुशोभित हैं; और तृतीय सत्येन्द्र पाठक, जो संस्कृत के अध्यापन में तत्पर हैं।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा (पाठक) ने संस्कृत व्याकरण के गहन अध्ययन एवं अनुसन्धान में विशेष साधना की और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। संस्कृत भाषा एवं शास्त्रों के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन, मनन और पारम्परिक ज्ञान-परम्परा से भी उनका गहरा सम्बन्ध रहा है। इस प्रकार उनके व्यक्तित्व में संस्कृत-वाङ्मय, व्याकरण एवं ज्योतिषीय शास्त्र-अध्ययन की परम्परा का समन्वय दिखाई देता है।

यह वंश-विवरण पं. अखिलानन्द शर्मा कृत ग्रन्थ के संस्कृत ग्रन्थकार-परिचय तथा पारिवारिक अभिलेख पर आधारित है।

परम्परा का अर्थ केवल यह नहीं कि पूर्वजों ने क्या किया। उसका अर्थ यह भी है कि उनके हाथों से जो विद्या आगे बढ़ी, वह आज भी उसी निष्ठा से पढ़ी और आगे दी जा रही है या नहीं।

इसीलिए इस मंच पर जो कुछ कहा जाता है, वह प्रमाण सहित कहा जाता है — किस ग्रन्थ में, किस सन्दर्भ में। जहाँ शास्त्र मौन है, वहाँ मौन रहना भी परम्परा का ही अंग है।

शास्त्र से जुड़ा कोई प्रश्न है?

लेखों में बहुत-से उत्तर मिल जाएँगे। जो न मिले, वह पूछ लीजिए।

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