डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा

परिचय

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा

व्याकरणाचार्य  •  पी-एच.डी. (संस्कृत व्याकरण)  •  वैदिक ज्योतिष

परिचय और उनकी मुख्य बातें — सरल भाषा में।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा संस्कृत के विद्वान हैं। उन्होंने संस्कृत व्याकरण में पी-एच.डी. की है। शास्त्र और ज्योतिष — दोनों उनके अध्ययन के विषय रहे हैं।

उनके घर में यह नई बात नहीं है। सात पीढ़ियों से उनके परिवार में यही काम होता आया है — पढ़ना, पढ़ाना और ग्रन्थ लिखना। उनके पिता पं. होमनिधि जी ज्योतिषाचार्य थे। ज्योतिष की पहली शिक्षा उन्हें घर पर ही मिली।

नीचे उनकी वे बातें सरल भाषा में दी गई हैं, जो वे अक्सर लोगों से कहते हैं।

पहली बात

परम्परा का मतलब आँख बंद करके चलना नहीं है

अक्सर कहा जाता है — जो हमारे बड़े करते आए हैं, वही करना चाहिए। डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा इस बात को अधूरा मानते हैं।

वे मनुस्मृति का एक श्लोक याद दिलाते हैं:

येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यति ॥

अर्थ — जिस रास्ते पर पिता चले, जिस पर दादा चले, उसी अच्छे लोगों के रास्ते पर चलो — उस पर चलने वाले को कष्ट नहीं होता।

अब यहाँ एक सवाल उठता है, और लोग पूछते भी हैं — बहुत लोगों के माता-पिता ग़लत रास्ते पर भी होते हैं। तो क्या बच्चा भी उसी पर चले?

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा कहते हैं — श्लोक को दोबारा पढ़िए। उसमें लिखा है “सताम् मार्गम्”, यानी अच्छे लोगों का रास्ता। सिर्फ़ ‘पिता का रास्ता’ नहीं लिखा।

वेद में भी यही कहा गया है —

असतो मा सद्गमय ।

अर्थ — ग़लत से सही की ओर ले चलो।

तो बात इतनी-सी है: जहाँ-जहाँ आपके बड़े सही रास्ते पर चले, वहाँ उनके पीछे चलिए। जहाँ नहीं चले, वहाँ नहीं।

उनके परिवार का यह वंश-क्रम कोई सुनी-सुनाई बात नहीं है — वह एक संस्कृत ग्रन्थ के श्लोकों में लिखा हुआ है। सात पीढ़ियों का वंश-वृक्ष देखिए →

उनके पिता

वह श्लोक, जो सभा में किसी को पूरा नहीं आया

पहली पढ़ाई घर पर हुई। पिता पं. होमनिधि पाठक जी ज्योतिषाचार्य थे, इसलिए ज्योतिष की बातें बचपन से कान में पड़ती रहीं।

उनके बारे में डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा कहते हैं कि वे ऋषि जैसे थे। जीवन में कभी सिला हुआ कपड़ा नहीं पहना। चौदह साल तक आग पर पका हुआ अन्न नहीं खाया। जीवन में कभी झूठ नहीं बोला।

नोएडा में महर्षि विद्यापीठ संस्थान खुला था। वहाँ पूरे भारतवर्ष के विद्वान इकट्ठा होते थे — कहीं कोई विद्वान होता तो गाड़ी भेजकर उसे खोजकर लाया जाता था, चाहे जितना ख़र्च हो जाए। वहाँ एक बड़ा वैदिक सम्मेलन और शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें देश-विदेश से लोग आए। महर्षि महेश योगी भी वहाँ उपस्थित थे।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा उस समय लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ से शिक्षा-शास्त्री कर रहे थे और सभा में बैठकर सुन रहे थे। वहाँ एक-एक शब्द पर तीन-तीन घंटे शास्त्रार्थ चलता था, और ज्योतिष पर घंटों।

तभी संचालन कर रहे विद्वान ने एक श्लोक बोला और बीच में ही आधा भूल गए। उन्होंने सभा में बैठे सब विद्वानों से कहा — इसे पूरा कीजिए।

किसी ने नहीं किया।

तब उन्होंने नाम लेकर पुकारा —

“पं. होमनिधि पाठक, क्या यह श्लोक पूरा नहीं हो सकता?”

वह श्लोक जातक पारिजात की एक टीका का था। उसमें बताया गया था कि जुड़वाँ बच्चों की आयु का निर्णय कैसे किया जाए — क्योंकि जुड़वाँ बच्चों के जन्म में पाँच-दस मिनट का ही अंतर होता है और दोनों की ग्रह-स्थिति लगभग एक जैसी रहती है। इसलिए यह निर्णय बहुत कठिन माना जाता है।

पं. होमनिधि जी ने पहले उसका मूल श्लोक बोला, फिर उसकी टीका भी बोली।

तीन बार श्लोक सुनाया गया। दिसम्बर का महीना था। सभा में सत्यव्रत जी, प्रियव्रत जी और हरदेव जी जैसे पंचांग बनाने वाले विद्वान भी बैठे थे। किसी को उसका एक चरण तक स्मरण नहीं हुआ — अर्थ तो दूर की बात थी।

तब एक विद्वान बोले —

“आचार्य जी, यह श्लोक तो पी-एच.डी. के योग्य है। इस पर तो पी-एच.डी. होनी चाहिए।”

आगे चलकर उन्होंने यह भी कहा —

“यह सरस्वती किस पर कृपा करें? इन्हें वेशभूषा से कोई लेना-देना नहीं। कहाँ बैठी हैं — आज पता चला।”

यह बात इसलिए कही गई कि पं. होमनिधि जी का पहनावा बहुत साधारण था — आधी धोती बाँधते थे, आधी ओढ़ते थे।

इसी सम्मेलन की मंडली एक दिन भोजन के लिए निकली। उन्हें ले जा रहे थे बालकृष्ण जी, जो पं. होमनिधि जी के शिष्य थे। रास्ते में उनका घर पड़ता था, सो सब वहीं रुक गए।

पं. होमनिधि जी उस समय आँगन में वह जगह साफ़ कर रहे थे जहाँ गाय आकर बैठती थी — ताकि शाम को उसे ठीक जगह मिले। बालकृष्ण जी ने परिचय कराया कि ये हमारे गुरु जी हैं। किसी ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।

पं. होमनिधि जी ने कुछ नहीं कहा। बस इतना बोले — “अरे बालकृष्ण जी, आपने बहुत अच्छा किया।”

सभा में बैठे उस विद्यार्थी ने यह सब देखा। उसके मन में एक ही बात आई —

“क्या हम भी ऐसे बन सकते हैं?”

काशी

बनारस का टिकट

दिल्ली से लौटते समय तय हो चुका था कि अब विद्वान बनकर ही लौटना है।

दिल्ली स्टेशन पर हाथ में एक थैला था। घर की रीति यह थी कि पैसा पुस्तक के भीतर ही रखा जाता है — सो कुछ पैसे पुस्तक में रखे हुए थे। उन्होंने वहीं से सीधा बनारस का टिकट ले लिया। लगभग सन् 1988–89 की बात है।

पता बस इतना मालूम था कि वाराणसी में धर्मसंघ विद्यालय है — दुर्गाकुण्ड के पास, धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का स्थापित किया हुआ। वहाँ पुराने ढंग से वेद, व्याकरण, ज्योतिष, न्याय और कर्मकाण्ड पढ़ाया जाता था।

वहाँ उन्हें राजेन्द्र जी का नाम याद था, उन्हीं से मिलना था। द्वार पर उस समय लक्ष्मण जी और शंकरानन्द जी बैठे थे। उन्होंने पूछा — कहाँ से आए हो?

उत्तर मिला — नरवर से। नरवर का नाम सुना हुआ था।

फिर एक शर्त रख दी गई — मिलवा देंगे, पर पहले ‘विरक्त’ शब्द का अर्थ कीजिए।

उन्होंने तीन अर्थ बताए:

पहला अर्थ

विशेषेण आसक्तः

जो किसी एक चीज़ में विशेष रूप से लगा हो — वह विरक्त है।

दूसरा अर्थ

विगत-रागः

जिसके मन से लगाव और बैर निकल गया — क्रोध, लोभ और मोह जिसके भीतर से निकल गए — वह विरक्त है।

तीसरा अर्थ

विष्णु-रक्तः

जो भगवान विष्णु में लगा हुआ है — वह विरक्त है।

पहला अर्थ सुनकर वे हँस पड़े और बोले — मैंने तो अनुभव के आधार पर पूछा था; आज गृहस्थ, संत और ब्रह्मचारी में अंतर ही मालूम नहीं पड़ता। तब उन्होंने दूसरा और तीसरा अर्थ बताया।

तीनों सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और भीतर स्थान मिल गया। वहीं से काशी का अध्ययन शुरू हुआ। आगे चलकर उन्होंने संस्कृत व्याकरण में पी-एच.डी. की।

धर्मसंघ के पास ही बाबा कीनाराम का स्थान है, जहाँ तंत्र-विधि से उपासना होती है। वहाँ मणिकर्णिका घाट से लकड़ियाँ आती हैं और उन्हीं से हवन होता है। वे वहाँ भी गए और साधना कर रहे महात्मा को प्रणाम किया। महात्मा ने भभूत दी और दक्षिणा माँगी। उन्होंने कहा — हम तो पढ़ने आए हैं, दक्षिणा कहाँ से लाएँ। महात्मा बोले — पुस्तक में से निकालिए।

यानी उन्हें पता था कि पैसा पुस्तक में रखा है।

दूसरी बात

बात करने के तीन तरीक़े होते हैं

यह भेद शास्त्र में बहुत पुराना है, लेकिन आज के समय में शायद पहले से ज़्यादा काम का है।

जल्प

सिर्फ़ कहना

जहाँ हमें बस कहना ही कहना है, सुनना नहीं है। सामने वाले की बात के लिए वहाँ जगह ही नहीं होती।

वितण्डा

सिर्फ़ काटना

जहाँ दूसरे को ग़लत साबित करना ही पूरा मक़सद है। पूछिए कि फिर सही क्या है — तो जवाब नहीं मिलता। बस ‘आप ग़लत हैं’।

वाद-संवाद

जहाँ बात निकलती है

जहाँ दोनों कहते भी हैं और सुनते भी हैं — और बात में से एक बात निकलकर आती है।

वादे वादे जायते तत्त्वबोधः ।

अर्थ — बार-बार की बातचीत से ही असली बात समझ में आती है।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा सिर्फ़ तीसरे तरीक़े को मानते हैं।

इसका असर आप इस website के हर पन्ने पर देख सकते हैं — हर जवाब प्रमाण के साथ दिया जाता है, और कहीं डर की भाषा नहीं लिखी जाती। जो शास्त्र में है, वह लिखा जाता है। जो नहीं है, वह नहीं लिखा जाता।

तीसरी बात

पूजा-पाठ को पाखंड कहना ठीक नहीं

आजकल कुछ लोग कहते हैं कि पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड की कोई ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ ज्ञान काफ़ी है।

ऐसे लोग प्रायः स्वयं को अद्वैतवादी बताते हैं। अद्वैत शंकराचार्य जी का सिद्धांत है; उसके सामने द्वैत का सिद्धांत है, जिसे वल्लभ सम्प्रदाय मानता है — जिसमें जीव और ईश्वर को अलग-अलग माना जाता है।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा इससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि यह सीढ़ी की सबसे ऊपर वाली पैड़ी पर सीधे पैर रखने जैसा है। तीन चीज़ें हैं, और तीनों का अपना काम है:

॥ तीनों का अपना काम

  • कर्मकाण्ड — पूजा, विधि, संस्कार। इससे मन साफ़ होता है।
  • उपासना — भक्ति और ध्यान। इससे मन टिकता है।
  • ज्ञानकाण्ड — वेदान्त। यह सबसे आख़िर में आता है, और तभी समझ आता है।

जिसका मन न साफ़ हुआ हो और जिसने टिकना न सीखा हो, वह सीधे ज्ञान की बात पकड़ ही नहीं पाएगा।

वे तुलसीदास जी की बात भी याद दिलाते हैं — जिसे ब्रह्मज्ञान भी नहीं हुआ और जिसने कर्म भी छोड़ दिए, उसके हाथ कुछ नहीं आता।

और वे एक बात जोड़ते हैं, जो सुनने में सीधी है पर गहरी है। अद्वैत का अर्थ है जहाँ दूसरा न हो — और जहाँ दूसरे का चिंतन होता है, वहीं भय पैदा होता है। प्रह्लाद को पहाड़ से गिराया गया, नदी में डुबोया गया, आग में जलाया गया — पर वे बच गए, क्योंकि उनके लिए ब्रह्म के अलावा कुछ था ही नहीं; वे सबमें अपनी ही आत्मा देख रहे थे।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा कहते हैं कि उनकी अपनी निष्ठा अद्वैत में नहीं, भगवान में है। आयु, कर्म, कितनी विद्या आनी है, कहाँ और किसके द्वारा जाना है — यह सब ब्रह्मा जी ने गर्भ में ही लिख दिया होता है।

इसीलिए एक बात पर वे बहुत ज़ोर देते हैं: नए बच्चों से यह मत कहिए कि संध्या-वंदन की ज़रूरत नहीं है। जिन घरों में यह परम्परा अब तक चल रही है, जिनका यज्ञोपवीत समय पर हुआ है, जो आज भी संध्या करते हैं — उन्हें तोड़ देना सबसे बड़ा नुक़सान है।

और खण्डन भी कठोर शब्दों में नहीं करना चाहिए, यह वे हर बार जोड़ते हैं।

चौथी बात

शास्त्र किसी एक के पक्ष में नहीं लिखे गए

एक आरोप बार-बार दोहराया जाता है — कि ग्रन्थ कुछ लोगों ने अपने फ़ायदे के लिए लिख लिए।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा इसका जवाब एक श्लोक से देते हैं:

इदं पुण्यमिदं पापमित्यस्मिन् पदद्वये ।
आ चाण्डालं मनुष्याणां शास्त्रं समप्रयोजनम् ॥

अर्थ — ‘यह पुण्य है’ और ‘यह पाप है’ — बस यही दो बातें हैं। और इन दोनों में शास्त्र का काम सब मनुष्यों के लिए एक जैसा है — चाण्डाल तक के लिए।

यानी भेद शास्त्र ने नहीं किया।

यही बात वे स्त्रियों के बारे में भी कहते हैं। मनुस्मृति में से आलोचक वही श्लोक उठाते हैं जिनमें रोक-टोक है; जहाँ प्रशंसा लिखी है, वहाँ नहीं जाते। और वह श्लोक भी उन्हीं मनु का है:

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

अर्थ — जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, देवता वहीं रहते हैं।

मनुस्मृति के बारे में उनकी बात भी साफ़ है, और वह दोनों पक्षों से अलग है।

वे कहते हैं — जैसे आज हमारा संविधान है, जिसे डॉ. अम्बेडकर ने बनाया और जिसके अनुसार देश चलता है, वैसे ही पहले ऋषि-महर्षियों का संविधान था। मनुस्मृति सत्ययुग का विधान थी। कलियुग के लिए पाराशर स्मृति बताई गई है।

कलौ पाराशरः स्मृतः ।

अर्थ — कलियुग में पाराशर स्मृति मानी गई है।

और एक चेतावनी वे हमेशा जोड़ते हैं: श्लोक का अर्थ शब्दों से नहीं निकलता, टीका से निकलता है। बिना टीका पढ़े किसी श्लोक पर फ़ैसला सुना देना — चाहे पक्ष में हो या विरोध में — ठीक नहीं है।

पाँचवीं बात

आज का भ्रम — दो तरह का होता है

पहला है आभास। जैसे अँधेरे में पड़ी रस्सी को कोई साँप समझ ले। रस्सी न कभी साँप थी, न कभी होगी — पर देखने वाले को वैसा ही दिख रहा है। बहुत-सी ग़लतफ़हमियाँ इसी तरह की होती हैं, और इनमें किसी की नीयत ख़राब नहीं होती।

दूसरा है दम्भ, यानी पाखंड। इसके बारे में वे कहते हैं कि इसे पहचानना हम जैसों के बस का नहीं। शास्त्र में तो यहाँ तक कहा गया है कि सोच-समझकर किए गए पाखंड का अंत ख़ुद ब्रह्मा जी भी नहीं पा सके।

इसके लिए वे एक कथा सुनाते हैं। ब्रह्मा जी की सृष्टि में सब हुए — अधर्म भी, धर्म भी। एक बार दम्भ का नाती ब्रह्मलोक पहुँचा। वहाँ ऋषि-महर्षियों की सभा चल रही थी। उसने अपने साथ गंगाजल और कुश रखे और कहा — यहाँ तो बहुत लोग बैठे हैं, इनकी साँस से मैं अपवित्र हो जाऊँगा। फिर उसने कुश से जल छिड़कना शुरू किया — ब्रह्मा जी पर भी, यह कहकर कि आपके भी चार-पाँच मुख हैं।

ब्रह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। बोले — कितनी दिव्य आत्मा है, कितना संस्कारी है। उन्होंने उसे गोद में बैठा लिया।

बाद में ध्यान करने पर पता चला कि वह दम्भ का ही नाती था। तब ब्रह्मा जी ने कहा — जब मैं ही तुम्हें नहीं पहचान पाया, तो संसार में कौन पहचानेगा।

पाखंड का तरीक़ा भी वे बताते हैं। जहाँ लोग शास्त्र नहीं जानते, वहाँ जाकर अपनी बात फैलाना। वहाँ से सम्मान पाना। और साथ-साथ पढ़े-लिखे विद्वानों और संतों के ख़िलाफ़ नफ़रत खड़ी कर देना — ताकि जाँचने वाला कोई बचे ही नहीं।

ऐसे लोगों को वे न ज़्यादा सुनते हैं, न देखते हैं।

लेकिन जहाँ बात नए विद्यार्थियों तक पहुँच रही हो, वहाँ वे चुप नहीं रहते। कहते हैं, तब भीतर से दुख होता है — कि कहीं अधर्म ही धर्म न बन जाए।

उनके जीवन से

काशी के कठिन दिन

यह उनके जीवन की एक निजी बात है। यह किसी बीमारी का इलाज नहीं है और न ही डॉक्टरी सलाह — बीमारी में योग्य चिकित्सक से ही सलाह लीजिए।

काशी के बारे में कहा जाता है कि जो वहाँ रहने जाता है, पहले छह महीने उसकी परीक्षा होती है। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ।

शरीर में गाँठें बन गईं और बुख़ार 107–108 डिग्री तक चला गया। रामकृष्ण मिशन के अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। वहाँ डॉ. ब्रह्मेश जी थे, एम.डी., विदेश से पढ़कर आए हुए। उन्होंने कहा कि पूरे शरीर में गाँठें हैं, ऑपरेशन करना होगा — और उसके लिए ज़रूरी मशीन यहाँ नहीं है, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अस्पताल में है।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा ने काशी की परिक्रमा से बाहर जाने से मना कर दिया। उनके भीतर एक ही भाव था — काश्यां मरणान्मुक्तिः। शरीर जाना ही है तो काशी में जाए।

अस्पताल ने पहले ही हस्ताक्षर करा लिए — यदि शरीर न बचे तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं; अपना पूरा पता लिख दीजिए। पते की जगह उन्होंने लिखा:

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।

अर्थ — माता पार्वती हैं, पिता महेश्वर हैं। इस नगरी में इसके अलावा मेरा कोई पता नहीं।

डॉक्टरों ने कहा — यह तो आध्यात्मिक बात हुई; व्यवहार में जो माता-पिता हैं, वह लिखिए। उन्होंने मना कर दिया।

बड़े भाई आसाम से लौटते हुए मिलने आए। हाल देखकर रो पड़े और घर चलने को कहा। उत्तर मिला — संकल्प लेकर आया हूँ, पूरा हुए बिना नहीं जाऊँगा। भाई रोते हुए, पीठ किए बिना, उन्हीं की ओर देखते हुए कमरे से निकले।

उस रात उन्होंने पूरी रात गजेन्द्र-मोक्ष का पाठ किया। शरीर में बहुत पीड़ा थी। सुबह उन्होंने डॉ. ब्रह्मेश जी से कहा — कोई ऐसी दवा दीजिए जो अभी दर्द में राहत दे। डॉक्टर बोले — आप ज़िद्दी हैं, वहाँ चले जाते तो सब हो जाता। फिर उन्होंने नीचे से एक गोली मँगवाकर दी, और उससे पूरी राहत मिल गई।

आगे व्यवस्था बनी और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की डॉक्टरों की टीम वहीं आ गई। पूरी जाँच के बाद टीम ने कहा — “गाँठ तो कहीं दिख ही नहीं रही।” उन्होंने पूछा कि ऐसी कौन-सी दवा दी गई जिससे बिना ऑपरेशन सब गाँठें चली गईं। डॉ. ब्रह्मेश जी ने दवा का नाम बताया, तो वे बोले — यह तो दर्द की दवा है, रोग की नहीं।

इसके कई साल बाद, लगभग सन् 2000 में, आँतों में तकलीफ़ हुई। वे दिल्ली के गोविन्द बल्लभ पंत अस्पताल जाँच कराने गए। वहाँ एक वरिष्ठ डॉक्टर ने, जाँच के बाद, वह बात कही जो कोई नहीं सुनना चाहता। उनके परिचित जीवेश जी भी साथ थे; सुनकर उन्हें पसीना आ गया।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा ने कहा — आप क्यों दुखी हो रहे हैं? यह तो भगवान की कृपा है। बड़ी बीमारी आती है तो भजन बढ़ जाता है और दुनिया का मोह घटता है।

उन्होंने यह बात घर में किसी को नहीं बताई। जो दो-चार लोग जानते थे, उन्हें भी मना कर दिया कि इसकी चर्चा मत करना।

उन्होंने अपना भजन बढ़ा दिया — अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः। इन तीन नामों के बारे में कहा गया है कि इनसे बड़ी बीमारी दूर होती है। एक महात्मा ने बताया था कि सामने जल रखकर एक माला जप कीजिए और फिर वह जल पी लीजिए। पर संकल्प में उन्होंने अपनी बीमारी ठीक होने की माँग कभी नहीं की।

उन्हीं दिनों उत्तराखंड से विशुद्धानन्द जी का फ़ोन आया — किसी शिष्य के बच्चे के दाख़िले के सिलसिले में। बात करते-करते पता चला कि वे पहाड़ी गायों के गोमूत्र से दवा बनाते हैं; पहाड़ी गायें जड़ी-बूटियों पर चरती हैं, इसलिए उनका गोमूत्र बहुत गुणकारी माना जाता है।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया। बस एक विद्यार्थी को देहरादून से भी आगे भेजकर दवा मँगवा ली और छह महीने ली। किसी को पता नहीं चला।

छह महीने बाद वे ख़ुद दोबारा गोविन्द बल्लभ पंत अस्पताल जाँच कराने गए। डॉक्टर ने पुरानी रिपोर्ट देखी, फिर उन्हें देखा, और बड़े आश्चर्य में पड़ गए।

यह सब सुनाते हुए वे एक बात ज़रूर जोड़ते हैं:

“हम यह चाहते हैं कि कहीं हमारे मुँह से ऐसी बात न निकल जाए जिसमें मिर्च-मसाला मिल जाए।”

जिसके पास ऐसी बात हो और जो उसे बढ़ा-चढ़ाकर न कहे — उसकी बाक़ी बातों पर भरोसा किया जा सकता है।

एक काम

ग्यारह विद्यार्थी और एक किराए की गाड़ी

अवन्तिका में एक गुरुकुल है। वहाँ महानन्द महाराज जी रहते हैं, जिन्होंने बहुत कठोर साधना की है — महेन्द्र पर्वत पर जाकर, जहाँ कोई नहीं कर सकता। बद्रीनाथ में और सतोपंथ में भी उन्होंने साधना की है। जंगल में एक छोटी-सी कुटिया है, पास में गौशाला है। वे प्रवचन नहीं करते। उनका कोई प्रचार कहीं नहीं मिलेगा। कभी दान नहीं माँगते।

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा वहाँ पहुँचे तो बात संकीर्तन की चल रही थी। उन्होंने कहा — संकीर्तन तो आज हर जगह हो रहा है। जो ख़त्म हो रही है, वह गुरुकुल पद्धति है। यह जंगल का स्थान है; यहाँ कोई संस्था खुल जाए तो शायद यह परम्परा बच जाए।

बात मान ली गई। उन्होंने देर नहीं की।

वे सीधे कर्णवास गए, बैकुंठ जी के पास — जो परम वैदिक हैं और दिल्ली में उनके साथ ही पढ़ते थे। दोनों की योजना पहले से थी कि एक अच्छा गुरुकुल खोलेंगे, जिसमें वेद, व्याकरण और ज्योतिष पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी न रहे। उनसे प्रार्थना करके ग्यारह विद्यार्थी और एक अध्यापक लिए। किराए की एक बोलेरो में सब वहाँ पहुँचे, और महाराज जी ने गुरुकुल की स्थापना कर दी।

आज वहाँ सौ-दो सौ विद्यार्थी हैं और लगभग दो हज़ार गायें। हर पक्ष में सहस्रचण्डी होती है — आश्विन और चैत्र मास में विद्यार्थी बड़ी पवित्रता से एक हज़ार पाठ करते हैं।

जिनकी कुटिया में यह सब शुरू हुआ था, वे आज भी उसी कुटिया में रहते हैं। यह सब कहाँ से चल रहा है, यह रहस्य पास रहकर भी किसी को मालूम नहीं।

तपसा प्राप्यते स्वर्गम् ।

अर्थ — तप से ही स्वर्ग मिलता है, तप से ही यश मिलता है, तप से ही सब कुछ मिलता है।

एक सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रम में डॉ. ज्ञानेंद्र शर्मा की सहभागिता

विशिष्ट अवसर

सार्वजनिक एवं आध्यात्मिक सहभागिता

विभिन्न आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों में सम्मानित सहभागिता।

चित्र: एक सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रम से। यह चित्र केवल डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा की सार्वजनिक सहभागिता का अभिलेख है — किसी व्यक्ति, पद, राजनीतिक दल या संगठन का समर्थन अथवा विज्ञापन नहीं।

आज

यह website क्यों बनी

एक पुरानी कहावत वे अक्सर दोहराते हैं — जिसके पास दाँत हैं उसके पास गन्ना नहीं, और जिसके पास गन्ना है उसके पास दाँत नहीं।

उनके शब्दों में: हम जैसे बहुत लोग हैं जिनके पास विद्या है, पर लोगों तक पहुँच नहीं — इसलिए बात थोड़े-से लोगों तक ही रह जाती है। और जिनके पास पहुँच है, उनमें ज़्यादातर ऐसे हैं जिनके पास वह चीज़ नहीं। कुछ लोग हैं जो सचमुच धर्म का काम कर रहे हैं, पर वे कम हैं।

यह website उसी दूरी को थोड़ा कम करने के लिए है।

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