चालीसा · भगवान शिव

श्री शिव चालीसा

भगवान शिव के स्वरूप, लीलाओं और करुणा का वर्णन। अन्तिम चौपाई में रचयिता ने अपना नाम अयोध्यादास बताया है।

चालीसा41 चौपाईविशेष: सोमवार, प्रदोष, शिवरात्रि
0/ 1

पाठ-गिनती

संकल्प के अनुसार पाठ गिनिए

दिनों का संकल्प

रोज़ याद दिलाएँcalendar में जोड़ें

दोहा

जय गणेश , मंगल मूल ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

भावार्थहे पार्वतीपुत्र गणेश! आप मंगल के मूल और ज्ञानी हैं, आपकी जय हो। अयोध्यादास विनती करते हैं — मुझे निर्भयता का वरदान दीजिए।

चौपाई

1

जय पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भावार्थहे पार्वतीपति, दीनों पर दया करने वाले शिव! आपकी जय हो; आप सदा सन्तों की रक्षा करते हैं।

2

चन्द्रमा सोहत ।
कुण्डल नागफनी के॥

भावार्थआपके मस्तक पर चन्द्रमा सुन्दर लगता है और कानों में नाग के फन के कुण्डल हैं।

3

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन लगाए॥

भावार्थआपका शरीर गौर वर्ण का है, जटाओं से गंगा बहती है, गले में मुण्डमाला और शरीर पर भस्म लगी है।

4

वस्त्र खाल सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥

भावार्थआप बाघ की खाल का वस्त्र पहने हैं; आपकी छवि देखकर नाग भी मोहित हो जाते हैं।

5

मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

भावार्थमाता मैना की दुलारी पार्वती जी आपके बाएँ अंग में विराजती हैं, उनकी छवि अनुपम है।

6

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

भावार्थआपके हाथ में त्रिशूल शोभा देता है, जो सदा दुष्टों का नाश करता है।

7

नन्दी गणेश सोहैं तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

भावार्थवहाँ नन्दी और गणेश जी ऐसे सुशोभित हैं, जैसे सरोवर के बीच कमल।

8

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि कौ कहि जात न काऊ॥

भावार्थकार्तिकेय, श्यामा (पार्वती) और गणपति के साथ आपकी यह छवि शब्दों में नहीं कही जा सकती।

9

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तबहिं दुख प्रभु आप निवारा॥

भावार्थदेवताओं ने जब भी आपको पुकारा, आपने तुरन्त उनका दुःख दूर किया।

10

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं ॥

भावार्थजब तारकासुर ने भारी उपद्रव किया, तब सब देवताओं ने मिलकर आपसे प्रार्थना की।

11

तुरत आप पठायउ।
महँ मारि गिरायउ॥

भावार्थआपने तुरन्त षडानन (कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने पल भर में उसे मार गिराया।

12

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

भावार्थआपने जलन्धर असुर का संहार किया; आपका यश सारा संसार जानता है।

13

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
तबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

भावार्थत्रिपुरासुर से युद्ध करके आपने कृपा कर सबको बचा लिया।

14

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु ॥

भावार्थभगीरथ ने भारी तप किया, तब हे त्रिपुरारि! आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की (गंगा को धारण किया)।

15

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

भावार्थदानियों में आपके समान कोई नहीं; आपके सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।

16

वेद माहि महिमा तुम गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

भावार्थवेदों ने आपकी महिमा गाई है, पर आप अकथनीय और अनादि हैं — आपका भेद कोई नहीं पा सका।

17

प्रकटे मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए ॥

भावार्थसमुद्र-मन्थन से विष की ज्वाला प्रकट हुई, जिससे देवता और असुर व्याकुल हो गए।

18

कीन्ह दया तहँ करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

भावार्थतब आपने दया करके सहायता की (विष पी लिया) और नीलकण्ठ कहलाए।

19

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

भावार्थजब श्रीराम ने आपकी पूजा की, तब उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दी।

20

कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं ॥

भावार्थजब श्रीविष्णु सहस्र कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे, तब आपने उनकी परीक्षा ली।

21

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहँ सोई॥

भावार्थआपने एक कमल छिपा लिया, तो विष्णु जी अपना कमल-नयन अर्पित करने को तैयार हो गए।

22

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

भावार्थऐसी कठिन भक्ति देखकर आप प्रसन्न हुए और मनचाहा वर दिया।

23

जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥

भावार्थहे अनन्त, अविनाशी, सबके हृदय में बसने वाले प्रभु! आपकी जय हो; आप सब पर कृपा करते हैं।

24

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

भावार्थ(भक्त कहता है) दुष्ट प्रवृत्तियाँ मुझे सताती हैं, मैं भटकता हूँ और मन को चैन नहीं मिलता।

25

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यह अवसर मोहि आन उबारो॥

भावार्थहे नाथ! मैं रक्षा के लिए पुकारता हूँ, इस समय आकर मुझे उबारिए।

26

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट ते मोहि आन उबारो॥

भावार्थत्रिशूल लेकर भीतर-बाहर के शत्रुओं को नष्ट कीजिए और मुझे संकट से निकालिए।

27

मात-पिता भ्राता सब कोई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥

भावार्थमाता-पिता, भाई — सब होते हुए भी संकट में कोई साथ नहीं देता।

28

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी॥

भावार्थहे स्वामी! एक आप ही की आशा है; आकर मेरा भारी संकट हरिए।

29

धन निर्धन को देत सदा ही।
जो कोई सो फल पाहीं॥

भावार्थआप निर्धन को सदा धन देते हैं; जो भी माँगता है, वह फल पाता है।

30

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

भावार्थमैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? हे नाथ! मेरी भूलें क्षमा कीजिए।

31

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

भावार्थहे शंकर! आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल के कारण और विघ्नों को मिटाने वाले हैं।

32

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥

भावार्थयोगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; सरस्वती और नारद आपको शीश नवाते हैं।

33

नमो नमो जय नमः शिवाय।
ब्रह्मादिक पार न पाय॥

भावार्थनमः शिवाय — आपको बार-बार नमस्कार; ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते।

34

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत हैं शम्भु सहाई॥

भावार्थजो मन लगाकर यह पाठ करता है, भगवान शम्भु उसके सहायक होते हैं।

35

ऋनिया जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥

भावार्थऋण से दबा हुआ व्यक्ति भी श्रद्धा से यह पाठ करे, तो उसका भार हल्का होने की आस्था कही गई है।

36

पुत्र होन की इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

भावार्थसन्तान की कामना रखने वाले के लिए भी शिव-कृपा की आस्था इसमें व्यक्त की गई है।

37

पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥

भावार्थत्रयोदशी के दिन विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर ध्यानपूर्वक हवन कराना बताया गया है।

38

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
तन नहिं ताके रहै कलेशा॥

भावार्थजो नियम से त्रयोदशी (प्रदोष) का व्रत करता है, उसके शरीर-मन के क्लेश दूर होते हैं — ऐसी मान्यता है।

39

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

भावार्थधूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर भगवान शंकर के सामने यह पाठ करना चाहिए।

40

जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

भावार्थइससे जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं और अन्त में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

41

कहै अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुख हरहु हमारी॥

भावार्थअयोध्यादास कहते हैं — हे प्रभु! मुझे आपकी ही आशा है; सब जानकर मेरे दुःख हरिए।

दोहा

नित नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीस।
तुम मेरी मनकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

भावार्थप्रतिदिन नियम से प्रातः उठकर यह चालीसा पढ़ें; हे जगदीश्वर! मेरी मनोकामना पूर्ण कीजिए।

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

पाठ शान्त मन और स्पष्ट उच्चारण से करें; भावार्थ समझकर पढ़ने से मन अधिक लगता है। पाठ में आई फलश्रुति कवि की श्रद्धा और परम्परा की आस्था है — इसे किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में न लें।

भावार्थ सरल हिन्दी में, अर्थ समझाने के लिए है।

WhatsApp Consultation