दोहा
जय गणेश , मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
भावार्थहे पार्वतीपुत्र गणेश! आप मंगल करने वाले और कृपालु हैं। दीनों के दुःख दूर करके हमें निहाल कीजिए।
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे , राखहु जन की लाज॥
भावार्थहे प्रभु शनिदेव! आपकी जय हो, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र! कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।
चौपाई
जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
भावार्थदयालु शनिदेव की जय हो; आप सदा भक्तों की रक्षा करते हैं।
चारि भुजा तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
भावार्थआपकी चार भुजाएँ और श्याम शरीर है; माथे पर रत्नों का मुकुट शोभा देता है।
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि विकराला॥
भावार्थआपका ललाट विशाल और मनोहर है; दृष्टि तिरछी और भौंहें गम्भीर हैं।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै॥
भावार्थकानों में कुण्डल चमचमाते हैं और वक्ष पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं संहारा॥
भावार्थआपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा है; आप पल भर में शत्रुओं का संहार करते हैं।
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन॥
भावार्थपिंगल, कृष्ण, छायानन्दन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःखभंजन —
सौरी मन्द शनी दश नामा।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥
भावार्थसौरि, मन्द और शनि — ये आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र! इन नामों से पूजा करने पर सब कार्य सिद्ध होते हैं।
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।
करैं क्षण माहीं॥
भावार्थजिस पर प्रभु प्रसन्न होते हैं, उस निर्धन को भी वे क्षण भर में राजा बना देते हैं।
पर्वतहू तृण होइ निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत॥
भावार्थआपकी दृष्टि से पर्वत तिनका हो जाता है और तिनका पर्वत बन जाता है — अर्थात् कर्म के अनुसार परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥
भावार्थश्रीराम को राज मिलने के समय वनवास मिला, और कैकेयी की बुद्धि फिर गई — कवि इसे भी शनि की दशा का प्रसंग बताते हैं।
बनहूँ में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गई चुराई॥
भावार्थवन में कपट-मृग दिखा और माता सीता का हरण हुआ।
लखनहिं शक्ति विकल करि डारा।
मचिगा दल में हाहाकारा॥
भावार्थलक्ष्मण जी शक्ति-बाण से अचेत हुए और सेना में हाहाकार मच गया।
रावण की गति मति बौराई।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥
भावार्थरावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसने श्रीराम से वैर बढ़ा लिया।
दियो कीट करि लंका।
बजि बजरंग बीर की डंका॥
भावार्थसोने की लंका मिट्टी हो गई और वीर हनुमान जी का डंका बजा।
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥
भावार्थराजा विक्रमादित्य पर आपकी दशा आई, तो चित्र का मोर हार निगल गया —
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भावार्थ— नौलखा हार की चोरी का आरोप उन पर लगा और उन्हें दण्ड भोगना पड़ा।
भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलहिं घर कोल्हू चलवायो॥
भावार्थकठिन दशा में उन्हें तेली के घर कोल्हू तक चलाना पड़ा।
विनय राग दीपक महँ कीन्हयो।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयो॥
भावार्थजब उन्होंने दीपक राग गाकर विनय की, तब आप प्रसन्न हुए और सुख लौटाया — विनय और भक्ति से दशा बदलती है।
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।
आपहुँ भरे डोम घर पानी॥
भावार्थराजा हरिश्चन्द्र की पत्नी बिकी और स्वयं राजा को डोम के घर पानी भरना पड़ा।
तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूँजी-मीन कूद गई पानी॥
भावार्थवैसे ही राजा नल पर दशा आई — भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।
पारवती को सती कराई॥
भावार्थजब आपकी दशा शिवजी पर आई, तो सती को (दक्ष-यज्ञ में) देह त्यागनी पड़ी।
तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥
भावार्थआपके ज़रा-सा देखते ही गौरीपुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।
बची द्रौपदी होति उघारी॥
भावार्थपाण्डवों पर आपकी दशा आई, तब द्रौपदी (श्रीकृष्ण की कृपा से) अपमान से बचीं।
कौरव के भी गति मति मारयो।
युद्ध महाभारत करि डारयो॥
भावार्थकौरवों की बुद्धि भी फिर गई और महाभारत का युद्ध हुआ।
कहँ मुख महँ धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला॥
भावार्थ(एक कथा के अनुसार) आप सूर्य को मुख में रखकर पाताल में कूद पड़े।
शेष देव लखि विनती लाई।
को मुख ते दियो छुड़ाई॥
भावार्थतब देवताओं की विनती पर आपने सूर्य को छोड़ दिया।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
जग मृग ॥
भावार्थप्रभु के सात वाहन बताए गए हैं — हाथी, गधा, हिरण, कुत्ता,
सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥
भावार्थसियार, सिंह आदि नख वाले पशु। ज्योतिष परम्परा इनके अलग-अलग फल बताती है।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥
भावार्थहाथी वाहन लक्ष्मी-आगमन का और घोड़ा सुख-सम्पत्ति का सूचक माना गया है।
हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥
भावार्थगधा कामों में अड़चन का और सिंह मान-सम्मान व सफलता का सूचक माना गया है।
बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
भावार्थसियार बुद्धि-भ्रम का और हिरण कष्ट का सूचक बताया गया है — यह परम्परागत प्रतीकात्मक वर्णन है।
जब आवहिं प्रभु स्वान ।
चोरी आदि होय डर भारी॥
भावार्थकुत्ते की सवारी हानि के प्रति सावधान रहने का संकेत मानी गई है।
तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥
भावार्थइसी प्रकार शनि के चार «पाये» बताए गए हैं — सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥
भावार्थलोहे का पाया कठिन समय का सूचक माना गया है।
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥
भावार्थताँबे का पाया सम फल, चाँदी शुभ, और सोने का पाया सर्व सुख-मंगल देने वाला माना गया है।
जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुँ न दशा निकृष्ट सतावै॥
भावार्थजो यह शनि-चरित्र नित्य गाता है, उसे कठिन दशा अधिक नहीं सताती — ऐसी आस्था है।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नशिब बलि ढीला॥
भावार्थप्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं और विरोधी शक्तियों का बल ढीला कर देते हैं।
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई॥
भावार्थजो योग्य विद्वान को बुलाकर विधि से शनि-ग्रह की शान्ति कराता है,
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥
भावार्थऔर शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाकर दीपदान करता है, वह बहुत सुख पाता है।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
भावार्थप्रभु के दास रामसुन्दर कहते हैं — शनिदेव के स्मरण से सुख का प्रकाश होता है।
दोहा
पाठ शनीश्चर देव को, कीन्हों «विमल» तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥
भावार्थ«विमल» ने शनिदेव का यह पाठ तैयार किया; श्रद्धा से चालीस दिन पाठ करने वाला भवसागर पार होता है — ऐसी आस्था है।
जो स्तुति दशरथ जी कियो, सम्मुख शनि निहार।
सरस सुभाषा में वही, ललिता लिखें सुधार॥
भावार्थराजा दशरथ ने शनिदेव के सामने जो स्तुति की थी, उसी को सरल-सुन्दर भाषा में «ललिता» ने सुधारकर लिखा।
