आरती · शनिदेव

जय जय श्री शनिदेव — शनिदेव की आरती

सूर्यपुत्र, छायानन्दन शनिदेव की आरती — शनिवार की पूजा और शनि-शान्ति के समय गाई जाती है।

आरती5 पदविशेष: शनिवार

आरती

दीप जलाइए, आरती गाइए

«आरती आरम्भ करें» दबाने पर थाली घूमने लगती है और हर कुछ क्षण में घण्टी बजती है — आप साथ में आरती गाइए। चाहें तो केवल घण्टी भी बजा सकते हैं।

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आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया ॥

भावार्थभक्तों का हित करने वाले शनिदेव की जय हो; आप सूर्य के पुत्र हैं और छाया आपकी माता हैं।

श्याम अंग दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥

भावार्थआपका शरीर श्याम है, दृष्टि तिरछी है और चार भुजाएँ हैं; आप नीले वस्त्र धारण करते हैं और हाथी पर सवार होते हैं।

मुकुट शीश राजित दिपत है ।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥

भावार्थसिर पर किरीट-मुकुट सुशोभित है, ललाट दमकता है; गले में मोतियों की माला की शोभा पर सब न्योछावर हैं।

मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द अति प्यारी॥

भावार्थआपको मोदक, मिठाई, पान और सुपारी चढ़ती है; लोहा, तिल, तेल, उड़द और भैंस आपको प्रिय माने गए हैं।

देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥

भावार्थदेवता, दानव, ऋषि, मुनि और नर-नारी आपका स्मरण करते हैं; «विश्वनाथ» ध्यान धरकर आपकी शरण में है (कई लोग इसे रचयिता का नाम मानते हैं)।

॥ इति ॥

आरती सम्पन्न हुई। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

पाठ शान्त मन और स्पष्ट उच्चारण से करें; भावार्थ समझकर पढ़ने से मन अधिक लगता है। पाठ में आई फलश्रुति कवि की श्रद्धा और परम्परा की आस्था है — इसे किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में न लें।

भावार्थ सरल हिन्दी में, अर्थ समझाने के लिए है।

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