दोहा
जनक जननि , निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
भावार्थमाता-पिता के चरण-कमलों की धूल मस्तक पर धारण करके मैं माँ सरस्वती की वन्दना करता हूँ — हे दात्री! मुझे बुद्धि और बल दीजिए।
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनन्तु।
दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब ॥
भावार्थआपकी अपार, अनन्त महिमा सारे संसार में व्याप्त है; हे माँ! दुष्टों के पापों का नाश आप ही करती हैं।
चौपाई
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
भावार्थहे सम्पूर्ण बुद्धि और बल की राशि! आपकी जय हो; हे सर्वज्ञ, अमर, अविनाशी! आपकी जय हो।
जय जय जय वीणाकर धारी।
करती सदा सुहंस ॥
भावार्थहाथ में वीणा धारण करने वाली माँ की जय हो; आप सदा सुन्दर हंस पर सवार रहती हैं।
रूप चतुर्भुज धारी माता।
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
भावार्थहे चार भुजाओं वाली माता! आप सारे विश्व में विख्यात हैं।
जग में पाप बुद्धि जब होती।
तब ही धर्म की फीकी ज्योती॥
भावार्थजब संसार में पाप-बुद्धि बढ़ती है, तब धर्म की ज्योति फीकी पड़ जाती है।
तब ही मातु का निज अवतारी।
पाप हीन करती ॥
भावार्थतब माँ स्वयं अवतार लेकर संसार को पाप से मुक्त करती हैं।
वाल्मीकि जी थे हत्यारा।
तव प्रसाद जानै संसारा॥
भावार्थवाल्मीकि जी पहले हिंसक थे; आपकी कृपा से वे क्या बने, यह संसार जानता है।
रामचरित जो रचे बनाई।
आदि कवि की पदवी पाई॥
भावार्थउन्होंने रामायण रची और आदि कवि की पदवी पाई।
कालिदास जो भये विख्याता।
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
भावार्थकालिदास जो विख्यात हुए, वह भी हे माता! आपकी कृपा-दृष्टि से हुआ।
तुलसी सूर आदि विद्वाना।
भये और जो ज्ञानी नाना॥
भावार्थतुलसी, सूर आदि विद्वान और अन्य अनेक ज्ञानी हुए —
तिन्ह न और रहेउ ।
केवल कृपा आपकी अम्बा॥
भावार्थ— उनका और कोई सहारा नहीं था, हे अम्बा! केवल आपकी कृपा थी।
करहु कृपा सोइ मातु भवानी।
दुखित दीन निज दासहि जानी॥
भावार्थहे माँ भवानी! मुझे अपना दुःखी, दीन दास जानकर वैसी ही कृपा कीजिए।
पुत्र करहिं अपराध बहूता।
तेहि न धरइ चित माता॥
भावार्थपुत्र बहुत अपराध करता है, पर माता उन्हें मन में नहीं रखती।
राखु लाज जननि अब मेरी।
विनय करउँ भाँति बहु तेरी॥
भावार्थहे जननी! अब मेरी लाज रखिए; मैं अनेक प्रकार से आपकी विनती करता हूँ।
मैं अनाथ तेरी ।
कृपा करउ जय जय जगदम्बा॥
भावार्थमैं अनाथ हूँ, आप ही मेरा सहारा हैं; हे जगदम्बा! कृपा कीजिए, आपकी जय हो।
मधु-कैटभ जो अति बलवाना।
बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
भावार्थमधु और कैटभ नामक बलवान असुरों ने भगवान विष्णु से बाहुयुद्ध ठाना।
समर हजार पाँच में घोरा।
फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥
भावार्थपाँच हज़ार वर्ष तक घोर युद्ध हुआ, फिर भी वे पीछे नहीं हटे।
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।
बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
भावार्थतब माँ ने सहायता की और उन दुष्टों की बुद्धि उलट गई।
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
भावार्थइसी से उन दुष्टों की मृत्यु हुई; हे माँ! मेरा मनोरथ भी पूरा कीजिए।
चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता।
क्षण महु संहारे उन माता॥
भावार्थविख्यात असुर चण्ड-मुण्ड का माता ने क्षण भर में संहार किया।
रक्तबीज से समरथ पापी।
मुनि हृदय धरा सब काँपी॥
भावार्थरक्तबीज जैसे शक्तिशाली पापी से देवता, मुनि और धरती सब काँप उठे थे।
काटेउ सिर जिमि खम्बा।
बार बार बिनवउँ जगदम्बा॥
भावार्थमाँ ने उसका सिर केले के तने की तरह काट दिया; हे जगदम्बा! मैं बार-बार आपकी विनती करता हूँ।
जग प्रसिद्ध जो शुम्भ निशुम्भा।
क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥
भावार्थसंसार-प्रसिद्ध शुम्भ-निशुम्भ को भी हे अम्बा! आपने क्षण में परास्त किया।
भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई।
रामचन्द्र बनवास कराई॥
भावार्थआपने भरत की माता कैकेयी की बुद्धि फेरी, जिससे श्रीराम को वनवास हुआ —
एहि विधि रावण वध तू कीन्हा।
नर मुनि सबको सुख दीन्हा॥
भावार्थ— और इस प्रकार रावण-वध का मार्ग बना, जिससे देवता, मनुष्य और मुनि सबको सुख मिला।
को समरथ तव यश गुन गाना।
अनादि अनन्त बखाना॥
भावार्थआपके यश और गुण गाने में कौन समर्थ है? वेदों ने आपको अनादि और अनन्त बताया है।
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
भावार्थविष्णु और रुद्र भी, जिनकी आप रक्षा करने वाली हैं, आपकी महिमा गाते हैं।
रक्तदन्तिका और शताक्षी।
नाम अपार है दानव भक्षी॥
भावार्थरक्तदन्तिका, शताक्षी — दानवों का नाश करने वाली आपके अपार नाम हैं।
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
भावार्थआपने धरती पर कठिन कार्य किए, इसलिए सारा संसार आपको दुर्गा नाम से पुकारता है।
दुर्ग आदि हरनी तू माता।
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
भावार्थहे माता! आप कठिनाइयों को हरने वाली हैं; हे सुखदात्री! सदा कृपा कीजिए।
नृप कोपित को मारन चाहे।
में घेरे मृग नाहे॥
भावार्थजब कोई क्रोधित राजा मारना चाहे, या वन में हिंसक पशु घेर लें —
सागर मध्य के भंजे।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भावार्थ— या समुद्र के बीच तूफ़ान में नाव टूट जाए और कोई साथ न हो —
भूत प्रेत बाधा या दुख में।
हो दरिद्र अथवा संकट में॥
भावार्थ— या किसी बाधा, दुःख, दरिद्रता अथवा संकट में हो —
नाम जपे मंगल सब होई।
संशय इसमें करइ न कोई॥
भावार्थ— तब माँ का नाम जपने से मंगल होता है; इसमें कोई सन्देह न करे — ऐसी आस्था है।
पुत्रहीन जो भाई।
सबै छाँड़ि पूजें एहि भाई॥
भावार्थसन्तान की कामना से व्याकुल व्यक्ति सब छोड़कर माँ की पूजा करे —
करै पाठ नित यह चालीसा।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
भावार्थ— और नित्य यह चालीसा पढ़े, तो गुणवान सन्तान की आस्था कही गई है।
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।
संकट रहित अवश्य हो जावै॥
भावार्थधूप आदि और नैवेद्य चढ़ाने वाला संकटों से मुक्त होता है।
भक्ति मातु की करैं हमेशा।
निकट न आवै ताहि कलेशा॥
भावार्थजो सदा माँ की भक्ति करता है, क्लेश उसके पास नहीं आते।
बन्दी पाठ करें सत बारा।
बन्दी पाश दूर हो सारा॥
भावार्थबन्धन में पड़ा व्यक्ति सौ बार पाठ करे, तो उसके बन्धन कटते हैं।
रामसागर बाँधि हेतु भवानी।
कीजै कृपा दास निज जानी॥
भावार्थहे भवानी! रामसागर को अपना दास जानकर कृपा कीजिए।
दोहा
मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु, परूँ न मैं भव कूप॥
भावार्थहे माँ! आपकी कान्ति सूर्य जैसी है और मैं अन्धकार-रूप हूँ; मुझे डूबने से बचाइए, ताकि मैं संसार-रूपी कुएँ में न गिरूँ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।
राम सागर अधम को, आश्रय तू ही दे दातु॥
भावार्थहे माँ सरस्वती! सुनिए — मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए; इस अधम रामसागर को आश्रय देने वाली आप ही हैं।
