आरती · माँ सरस्वती

जय सरस्वती माता — सरस्वती जी की आरती

विद्या, ज्ञान और वाणी की देवी माँ सरस्वती की आरती — विद्यार्थियों और विद्या-आरम्भ के समय विशेष रूप से गाई जाती है।

आरती7 पदविशेष: बसन्त पंचमी, गुरुवार, अध्ययन का आरम्भ

आरती

दीप जलाइए, आरती गाइए

«आरती आरम्भ करें» दबाने पर थाली घूमने लगती है और हर कुछ क्षण में घण्टी बजती है — आप साथ में आरती गाइए। चाहें तो केवल घण्टी भी बजा सकते हैं।

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आरती

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनि, त्रिभुवन विख्याता॥

भावार्थहे माँ सरस्वती! आपकी जय हो; आप सद्गुणों के वैभव से सम्पन्न हैं और तीनों लोकों में विख्यात हैं।

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस , अतुल तेजधारी॥

भावार्थआपका मुख चन्द्रमा-सा है, आप कमल पर विराजती हैं, आपकी कान्ति मंगलकारी है; शुभ हंस आपकी सवारी है और आपका तेज अतुलनीय है।

बायें कर में वीणा, दायें कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥

भावार्थआपके बाएँ हाथ में वीणा और दाएँ हाथ में माला है; सिर पर मणियों का मुकुट और गले में मोतियों की माला शोभा देती है।

देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

भावार्थजो आपकी शरण में आए, आपने उनका उद्धार किया; आपने मन्थरा की बुद्धि में प्रवेश करके (रामकथा के माध्यम से) रावण-संहार का मार्ग बनाया।

विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और का, जग से नाश करो॥

भावार्थहे विद्या और ज्ञान देने वाली! ज्ञान का प्रकाश भरिए और संसार से मोह, अज्ञान और अन्धकार का नाश कीजिए।

धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥

भावार्थहे माँ! धूप, दीप, फल और मेवा स्वीकार कीजिए; ज्ञान के नेत्र देकर संसार का उद्धार कीजिए।

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥

भावार्थजो माँ सरस्वती की यह आरती गाता है, वह हितकारी और सुखकारी ज्ञान और भक्ति पाता है।

॥ इति ॥

आरती सम्पन्न हुई। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

पाठ शान्त मन और स्पष्ट उच्चारण से करें; भावार्थ समझकर पढ़ने से मन अधिक लगता है। पाठ में आई फलश्रुति कवि की श्रद्धा और परम्परा की आस्था है — इसे किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में न लें।

भावार्थ सरल हिन्दी में, अर्थ समझाने के लिए है।

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