शतनाम · भगवान श्रीराम

श्रीरामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

भगवान श्रीराम के एक सौ आठ नामों का स्तोत्र — «श्रीरामो रामभद्रश्च रामचन्द्रश्च शाश्वतः» से आरम्भ। राम नवमी, विवाह पंचमी और नित्य रामपूजा में इसका पाठ प्रचलित है।

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र18 श्लोकध्यान

पाठ से पहले — «ॐ» के विषय में

परम्परा के अनुसार «ॐ» (प्रणव) का उच्चारण यज्ञोपवीत संस्कार के बाद किया जाता है। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है, वे पाठ में आए «ॐ» को छोड़कर, या उसके स्थान पर «नमः» कहकर पाठ आगे करते रहें — भाव और श्रद्धा से किया गया पाठ पूर्ण है।

आपका चुनाव इस फ़ोन में याद रहता है; पूरे पाठ में «ॐ» उसी के अनुसार दिखेगा।

यज्ञोपवीत संस्कार — न्यूनतम, श्रेष्ठ और अधिकतम आयु
वर्णन्यूनतम आयुश्रेष्ठ आयुअधिकतम आयु
ब्राह्मण5वाँ वर्ष8वाँ वर्ष16 वर्ष
क्षत्रिय6ठा वर्ष11वाँ वर्ष22 वर्ष
वैश्य8वाँ वर्ष12वाँ वर्ष24 वर्ष

(आयु की गणना गर्भ से की जाती है।)

न्यूनतम आयु — मनुस्मृति 2.37

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥

अर्थ: ब्रह्मतेज की इच्छा हो तो ब्राह्मण का 5वें वर्ष में, बल की इच्छा हो तो क्षत्रिय का 6ठे वर्ष में और धन-समृद्धि की इच्छा हो तो वैश्य का 8वें वर्ष में उपनयन करें।

श्रेष्ठ आयु — मनुस्मृति 2.36

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से 8वें वर्ष में, क्षत्रिय का 11वें वर्ष में और वैश्य का 12वें वर्ष में करना चाहिए।

अधिकतम आयु — मनुस्मृति 2.38

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण के लिए 16 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 22 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष तक सावित्री का काल नहीं बीतता।

मनुस्मृति 2.39

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥

अर्थ: अधिकतम आयु के बाद भी जिनका संस्कार नहीं हुआ, वे सावित्री-पतित (व्रात्य) हो जाते हैं। उनके लिए प्रायश्चित्त (व्रात्य-स्तोम) करके ही उपनयन का विधान है।

(पारस्कर गृह्यसूत्र 2.5 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.37 में भी यही आयु-सीमाएँ बताई गई हैं।)

🙏 अपने बालक का यज्ञोपवीत संस्कार समय रहते कराएँ।

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ध्यान

श्रीराघवं दशरथात्मजमप्रमेयं
सीतापतिं रघुकुलान्वयरत्नदीपम् ।
आजानुबाहुमरविन्ददलायताक्षं
रामं निशाचरविनाशकरं नमामि ॥ १॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने सुस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम् ॥ २॥

स्तोत्र — अष्टोत्तरशतनाम

श्रीरामो रामभद्रश्च रामचन्द्रश्च शाश्वतः ।
राजीवलोचनः श्रीमान्राजेन्द्रो रघुपुङ्गवः ॥ १॥

जानकीवल्लभो जैत्रो जितामित्रो जनार्दनः ।
विश्वामित्रप्रियो दान्तः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ २॥

वालिप्रमथनो वाग्मी सत्यवाक्सत्यविक्रमः ।
सत्यव्रतो व्रतधरः सदा हनुमदाश्रितः ॥ ३॥

कौसलेयः खरध्वंसी विराधवधपण्डितः ।
विभीषणपरित्राता हरकोदण्डखण्डनः ॥ ४॥

सप्ततालप्रभेत्ता च दशग्रीवशिरोहरः ।
जामदग्न्यमहादर्पदलनस्ताटकान्तकः ॥ ५॥

वेदान्तसारो वेदात्मा भवरोगस्य भेषजम् ।
दूषणत्रिशिरोहन्ता त्रिमूर्तिस्त्रिगुणात्मकः ॥ ६॥

त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा पुण्यचारित्रकीर्तनः ।
त्रिलोकरक्षको धन्वी दण्डकारण्यपावनः ॥ ७॥

अहल्याशापशमनः पितृभक्तो वरप्रदः ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितामित्रो जगद्गुरुः ॥ ८॥

ऋक्षवानरसंघाती चित्रकूटसमाश्रयः ।
जयन्तत्राणवरदः सुमित्रापुत्रसेवितः ॥ ९॥

सर्वदेवादिदेवश्च मृतवानरजीवनः ।
मायामारीचहन्ता च महादेवो महाभुजः ॥ १०॥

सर्वदेवस्तुतः सौम्यो ब्रह्मण्यो मुनिसंस्तुतः ।
महायोगी महोदारः सुग्रीवेप्सितराज्यदः ॥ ११॥

सर्वपुण्याधिकफलः स्मृतसर्वाघनाशनः ।
आदिदेवो महादेवो महापूरुष एव च ॥ १२॥

पुण्योदयो दयासारः पुराणपुरुषोत्तमः ।
स्मितवक्त्रो मिताभाषी पूर्वभाषी च राघवः ॥ १३॥

अनन्तगुणगम्भीरो धीरोदात्तगुणोत्तमः ।
मायामानुषचारित्रो महादेवादिपूजितः ॥ १४॥

सेतुकृज्जितवारीशः सर्वतीर्थमयो हरिः ।
श्यामाङ्गः सुन्दरः शूरः पीतवासा धनुर्धरः ॥ १५॥

सर्वयज्ञाधिपो यज्वा जरामरणवर्जितः ।
शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता सर्वावगुणवर्जितः ॥ १६॥

परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः ।
परं ज्योतिः परंधाम पराकाशः परात्परः ॥ १७॥

परेशः पारगः पारः सर्वदेवात्मकः परः ॥ १८॥

॥ इति श्रीरामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

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