दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
भावार्थहे माँ लक्ष्मी! कृपा करके मेरे हृदय में निवास कीजिए, मनोकामना सिद्ध कीजिए और मेरी आशा पूरी कीजिए।
सिंधु सुता विष्णुप्रिये, नत शिर बारम्बार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे, नत शिर बारम्बार॥
भावार्थहे समुद्र की पुत्री, विष्णुप्रिया! आपको बार-बार शीश नवाता हूँ। हे ऋद्धि-सिद्धि और मंगल देने वाली! आपको बार-बार नमन।
सोरठा
यही मोर , हाथ जोड़ विनती करूँ।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका॥
भावार्थहाथ जोड़कर मेरी यही प्रार्थना है — हे जगज्जननी! मेरे जीवन में हर प्रकार से सुख-सौरभ भर दीजिए।
चौपाई
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥
भावार्थहे सिन्धुसुता! मैं आपका स्मरण करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
तुम समान नहिं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
भावार्थआपके समान उपकारी कोई नहीं; सब प्रकार से मेरी आशा पूरी कीजिए।
जय जय जगत जननि जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो ॥
भावार्थहे जगत की माता जगदम्बा! आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं।
तुम ही हो घट घट के वासी।
विनती यही हमारी खासी॥
भावार्थआप ही हर हृदय में निवास करती हैं — यही हमारी विशेष विनती है।
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥
भावार्थहे जगज्जननी सिन्धुकुमारी! आपकी जय हो; आप दीनों का हित करने वाली हैं।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करौ जग जननि भवानी॥
भावार्थहे महारानी! मैं नित्य आपकी विनती करता हूँ; हे जगज्जननी भवानी! कृपा कीजिए।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध ॥
भावार्थमैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुधि लीजिए।
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।
जगत जननि विनती सुन मोरी॥
भावार्थमेरी ओर कृपा-दृष्टि से देखिए; हे जगज्जननी! मेरी विनती सुनिए।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥
भावार्थहे ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली माँ! हमारे संकट हरिए।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
भावार्थजब भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मन्थन कराया, तब समुद्र से चौदह रत्न निकले।
चौदह रत्न में तुम ।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
भावार्थउन चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; आपने प्रभु की सेविका बनकर उनकी सेवा की।
जब जब जन्म जहाँ प्रभु लीन्हा।
रूप बदल तहँ सेवा कीन्हा॥
भावार्थप्रभु ने जब-जब जहाँ जन्म लिया, आपने वहाँ रूप बदलकर उनकी सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
भावार्थजब स्वयं विष्णु ने मनुष्य शरीर धारण कर अयोध्या में अवतार लिया…
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय ॥
भावार्थ…तब आप जनकपुर में (सीता रूप में) प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से सेवा की।
अपनायो तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
भावार्थअन्तर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया; आप तीनों लोकों की स्वामिनी के रूप में विख्यात हैं।
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी।
कहँ तक महिमा कहौं बखानी॥
भावार्थआप सबसे प्रबल शक्ति हैं, दूसरी कोई नहीं; आपकी महिमा का कहाँ तक वर्णन करूँ।
मन वचन करै सेवकाई।
मन इच्छित वाँछित फल पाई॥
भावार्थजो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भाँति मनलाई॥
भावार्थछल, कपट और चतुराई छोड़कर, मन लगाकर अनेक प्रकार से आपकी पूजा करनी चाहिए।
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करै मन लाई॥
भावार्थऔर मैं समझाकर कहता हूँ — जो मन लगाकर यह पाठ करता है…
ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥
भावार्थ…उसे कोई कष्ट नहीं रहता और वह मनचाहा फल पाता है।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।
त्रिविध ताप भव बन्धन हारिणि॥
भावार्थहे दुःख दूर करने वाली! रक्षा कीजिए; आप तीनों तापों और संसार के बन्धन को हरने वाली हैं।
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे।
इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥
भावार्थजो यह चालीसा पढ़ता-पढ़ाता है और ध्यान से सुनता-सुनाता है…
ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
भावार्थ…उसे रोग नहीं सताते और वह सन्तान, धन और सम्पत्ति पाता है — ऐसी आस्था है।
पुत्र हीन अरु सम्पति हीना।
अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥
भावार्थसन्तान या सम्पत्ति से रहित, दृष्टिहीन, बधिर, रोगी या अत्यन्त दीन व्यक्ति भी…
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥
भावार्थ…ब्राह्मण को बुलाकर श्रद्धा से पाठ कराए और मन में शंका न लाए।
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं ॥
भावार्थजो चालीस दिन तक पाठ कराता है, उस पर भगवान शंकर (गौरीश) भी कृपा करते हैं।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥
भावार्थवह बहुत सुख-सम्पत्ति पाता है और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
भावार्थजो बारहों महीने पूजा करता है, उसके समान धन्य दूसरा कोई नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।
उन सम कोई जग में नाहीं॥
भावार्थजो प्रतिदिन मन में पाठ करता है, उसके समान संसार में कोई नहीं।
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
भावार्थमैं इसकी कितनी बड़ाई करूँ — ध्यान लगाकर स्वयं अनुभव कीजिए।
करि विश्वास करै व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै प्रेमा॥
भावार्थजो विश्वास के साथ व्रत और नियम करता है, उसका संकल्प सिद्ध होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
जय जय जय लक्ष्मी महारानी।
सब में व्यापित जो गुण खानी॥
भावार्थहे महारानी लक्ष्मी! आपकी जय हो; आप गुणों की खान हैं और सबमें व्याप्त हैं।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयाल कहुँ नाहीं॥
भावार्थसंसार में आपका तेज प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भावार्थमुझ अनाथ की अब सुधि लीजिए, संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दीजै दशा निहारी॥
भावार्थमेरी भूल-चूक क्षमा कीजिए और मेरी दशा देखकर दर्शन दीजिए।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
भावार्थआपके दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी भारी दुःख सह रहा है।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।
सब जानत हो अपने मन में॥
भावार्थमुझमें न ज्ञान है न बुद्धि; आप अपने मन में सब जानती हैं।
रूप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
भावार्थचतुर्भुज रूप धारण करके अब मेरे कष्ट दूर कीजिए।
कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
भावार्थमैं किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ — मुझमें अधिक ज्ञान-बुद्धि नहीं है।
रामदास अब कहै पुकारी।
करो दूर तुम विपति हमारी॥
भावार्थरामदास पुकारकर कहते हैं — हे माँ! हमारी विपत्ति दूर कीजिए।
दोहा
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो बेगि सब ।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रुन का नाश॥
भावार्थहे दुःख हरने वाली! रक्षा कीजिए और शीघ्र सब भय दूर कीजिए। हे लक्ष्मी! आपकी जय हो; (भीतर-बाहर के) शत्रुओं का नाश कीजिए।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की ॥
भावार्थरामदास नित्य ध्यान करके हाथ जोड़कर विनती करते हैं — हे माँ लक्ष्मी! इस दास पर दया की दृष्टि कीजिए।
