शतनाम · हनुमान जी

श्रीमदाञ्जनेयाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

हनुमान जी के एक सौ आठ नामों का स्तोत्र — «आञ्जनेयो महावीरो हनुमान्मारुतात्मजः» से आरम्भ। मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयन्ती पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र21 श्लोकफलश्रुति

पाठ से पहले — «ॐ» के विषय में

परम्परा के अनुसार «ॐ» (प्रणव) का उच्चारण यज्ञोपवीत संस्कार के बाद किया जाता है। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है, वे पाठ में आए «ॐ» को छोड़कर, या उसके स्थान पर «नमः» कहकर पाठ आगे करते रहें — भाव और श्रद्धा से किया गया पाठ पूर्ण है।

आपका चुनाव इस फ़ोन में याद रहता है; पूरे पाठ में «ॐ» उसी के अनुसार दिखेगा।

यज्ञोपवीत संस्कार — न्यूनतम, श्रेष्ठ और अधिकतम आयु
वर्णन्यूनतम आयुश्रेष्ठ आयुअधिकतम आयु
ब्राह्मण5वाँ वर्ष8वाँ वर्ष16 वर्ष
क्षत्रिय6ठा वर्ष11वाँ वर्ष22 वर्ष
वैश्य8वाँ वर्ष12वाँ वर्ष24 वर्ष

(आयु की गणना गर्भ से की जाती है।)

न्यूनतम आयु — मनुस्मृति 2.37

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥

अर्थ: ब्रह्मतेज की इच्छा हो तो ब्राह्मण का 5वें वर्ष में, बल की इच्छा हो तो क्षत्रिय का 6ठे वर्ष में और धन-समृद्धि की इच्छा हो तो वैश्य का 8वें वर्ष में उपनयन करें।

श्रेष्ठ आयु — मनुस्मृति 2.36

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से 8वें वर्ष में, क्षत्रिय का 11वें वर्ष में और वैश्य का 12वें वर्ष में करना चाहिए।

अधिकतम आयु — मनुस्मृति 2.38

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण के लिए 16 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 22 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष तक सावित्री का काल नहीं बीतता।

मनुस्मृति 2.39

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥

अर्थ: अधिकतम आयु के बाद भी जिनका संस्कार नहीं हुआ, वे सावित्री-पतित (व्रात्य) हो जाते हैं। उनके लिए प्रायश्चित्त (व्रात्य-स्तोम) करके ही उपनयन का विधान है।

(पारस्कर गृह्यसूत्र 2.5 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.37 में भी यही आयु-सीमाएँ बताई गई हैं।)

🙏 अपने बालक का यज्ञोपवीत संस्कार समय रहते कराएँ।

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स्तोत्र — अष्टोत्तरशतनाम

आञ्जनेयो महावीरो हनुमान्मारुतात्मजः ।
तत्त्वज्ञानप्रदः सीतादेवीमुद्राप्रदायकः ॥ १॥

अशोकवनिकाच्छेत्ता सर्वमायाविभञ्जनः ।
सर्वबन्धविमोक्ता च रक्षोविध्वंसकारकः ॥ २॥

परविद्यापरीहारः परशौर्यविनाशनः ।
परमन्त्रनिराकर्ता परयन्त्रप्रभेदकः ॥ ३॥

सर्वग्रहविनाशी च भीमसेनसहायकृत् ।
सर्वदुःखहरः सर्वलोकचारी मनोजवः ॥ ४॥

पारिजातद्रुमूलस्थः सर्वमन्त्रस्वरूपवान् ।
सर्वतन्त्रस्वरूपी च सर्वयन्त्रात्मकस्तथा ॥ ५॥

कपीश्वरो महाकायः सर्वरोगहरः प्रभुः ।
बलसिद्धिकरः सर्वविद्यासम्पत्प्रदायकः ॥ ६॥

कपिसेनानायकश्च भविष्यच्चतुराननः ।
कुमारब्रह्मचारी च रत्नकुण्डलदीप्तिमान् ॥ ७॥

सञ्चलद्वालसन्नद्धलम्बमानशिखोज्ज्वलः ।
गन्धर्वविद्यातत्त्वज्ञो महाबलपराक्रमः ॥ ८॥

कारागृहविमोक्ता च शृङ्खलाबन्धमोचकः ।
सागरोत्तारकः प्राज्ञो रामदूतः प्रतापवान् ॥ ९॥

वानरः केसरिसुतः सीताशोकनिवारकः ।
अञ्जनागर्भसम्भूतो बालार्कसदृशाननः ॥ १०॥

विभीषणप्रियकरो दशग्रीवकुलान्तकः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च वज्रकायो महाद्युतिः ॥ ११॥

चिरञ्जीवी रामभक्तो दैत्यकार्यविघातकः ।
अक्षहन्ता काञ्चनाभः पञ्चवक्त्रो महातपाः ॥ १२॥

लङ्किणीभञ्जनः श्रीमान् सिंहिकाप्राणभञ्जनः ।
गन्धमादनशैलस्थो लङ्कापुरविदाहकः ॥ १३॥

सुग्रीवसचिवो धीरः शूरो दैत्यकुलान्तकः ।
सुरार्चितो महातेजा रामचूडामणिप्रदः ॥ १४॥

कामरूपी पिङ्गलाक्षो वार्धिमैनाकपूजितः ।
कबलीकृतमार्तण्डमण्डलो विजितेन्द्रियः ॥ १५॥

रामसुग्रीवसन्धाता महारावणमर्दनः ।
स्फटिकाभो वागधीशो नवव्याकृतिपण्डितः ॥ १६॥

चतुर्बाहुर्दीनबन्धुर्महात्मा भक्तवत्सलः ।
सञ्जीवननगाहर्ता शुचिर्वाग्मी दृढव्रतः ॥ १७॥

कालनेमिप्रमथनो हरिमर्कटमर्कटः ।
दान्तः शान्तः प्रसन्नात्मा शतकण्ठमदापहृत् ॥ १८॥

योगी रामकथालोलः सीतान्वेषणपण्डितः ।
वज्रदंष्ट्रो वज्रनखो रुद्रवीर्यसमुद्भवः ॥ १९॥

इन्द्रजित्प्रहितामोघब्रह्मास्त्रविनिवारकः ।
पार्थध्वजाग्रसंवासी शरपञ्जरभेदकः ॥ २०॥

दशबाहुर्लोकपूज्यो जाम्बवत्प्रीतिवर्धनः ।
सीतासमेतश्रीरामभद्रपूजाधुरन्धरः ॥ २१॥

फलश्रुति

इत्येवं श्रीहनुमतो नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ २२॥

॥ इति श्रीमदाञ्जनेयाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

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