शतनाम · माँ गौरी (पार्वती)

श्रीगौर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

माँ गौरी (पार्वती) के एक सौ आठ नामों का स्तोत्र। भगवान दत्तात्रेय ने परशुराम (भार्गव) के प्रश्न पर यह स्तोत्र सुनाया; इसके ऋषि अङ्गिरा, छन्द अनुष्टुप् और देवता गौरी हैं। फलश्रुति में इसे आपत्ति-रूपी सागर से पार करने वाली दृढ़ नौका कहा गया है।

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र13 श्लोकविनियोग · ध्यान · फलश्रुति

पाठ से पहले — «ॐ» के विषय में

परम्परा के अनुसार «ॐ» (प्रणव) का उच्चारण यज्ञोपवीत संस्कार के बाद किया जाता है। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है, वे पाठ में आए «ॐ» को छोड़कर, या उसके स्थान पर «नमः» कहकर पाठ आगे करते रहें — भाव और श्रद्धा से किया गया पाठ पूर्ण है।

आपका चुनाव इस फ़ोन में याद रहता है; पूरे पाठ में «ॐ» उसी के अनुसार दिखेगा।

यज्ञोपवीत संस्कार — न्यूनतम, श्रेष्ठ और अधिकतम आयु
वर्णन्यूनतम आयुश्रेष्ठ आयुअधिकतम आयु
ब्राह्मण5वाँ वर्ष8वाँ वर्ष16 वर्ष
क्षत्रिय6ठा वर्ष11वाँ वर्ष22 वर्ष
वैश्य8वाँ वर्ष12वाँ वर्ष24 वर्ष

(आयु की गणना गर्भ से की जाती है।)

न्यूनतम आयु — मनुस्मृति 2.37

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥

अर्थ: ब्रह्मतेज की इच्छा हो तो ब्राह्मण का 5वें वर्ष में, बल की इच्छा हो तो क्षत्रिय का 6ठे वर्ष में और धन-समृद्धि की इच्छा हो तो वैश्य का 8वें वर्ष में उपनयन करें।

श्रेष्ठ आयु — मनुस्मृति 2.36

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से 8वें वर्ष में, क्षत्रिय का 11वें वर्ष में और वैश्य का 12वें वर्ष में करना चाहिए।

अधिकतम आयु — मनुस्मृति 2.38

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण के लिए 16 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 22 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष तक सावित्री का काल नहीं बीतता।

मनुस्मृति 2.39

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥

अर्थ: अधिकतम आयु के बाद भी जिनका संस्कार नहीं हुआ, वे सावित्री-पतित (व्रात्य) हो जाते हैं। उनके लिए प्रायश्चित्त (व्रात्य-स्तोम) करके ही उपनयन का विधान है।

(पारस्कर गृह्यसूत्र 2.5 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.37 में भी यही आयु-सीमाएँ बताई गई हैं।)

🙏 अपने बालक का यज्ञोपवीत संस्कार समय रहते कराएँ।

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पूर्वभाग

इति श्रुत्वा कथां पुण्यां गौरीवीर्यविचित्रिताम् ।
अपृच्छद् भार्गवो भूयो दत्तात्रेयं महामुनिम् ॥ १॥

भगवन्नद्भुततमं गौर्या वीर्यमुदाहृतम् ।
शृण्वतो न हि मे तृप्तिः कथां ते मुखनिःसृताम् ॥ २॥

गौर्या नामाऽष्टशतकं यच्छच्यै धिषणो जगौ ।
तन्मे कथय यच्छ्रोतुं मनो मेऽत्यन्तमुत्सुकम् ॥ ३॥

भार्गवेणेत्थमापृष्टो योगिराडत्रिनन्दनः ।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां प्राह गौर्या दयानिधिः ॥ ४॥

जामदग्न्य शृणु स्तोत्रं गौरीनामभिरङ्कितम् ।
मनोहरं वाञ्छितदं महाऽऽपद्विनिवारणम् ॥ ५॥

विनियोग

स्तोत्रस्याऽस्य ऋषिः प्रोक्त अङ्गिराश्छन्द ईरितः ।
अनुष्टुब् देवता गौरी आपन्नाशाय यो जपेत् ॥ ६॥

ह्रां ह्रीं इत्यादि विन्यस्य ध्यात्वा स्तोत्रमुदीरयेत् ।

ध्यान

सिंहसंस्थां मेचकाऽऽभां कौसुम्भांऽशुकशोभिताम् ॥ ७॥

खड्गं खेटं त्रिशूलं च मुद्गरं बिभ्रतीं करैः ।
चन्द्रचूडां त्रिनयनां ध्यायेद् गौरीमभीष्टदाम् ॥ ८॥

स्तोत्र — अष्टोत्तरशतनाम

गौरी गोजननी विद्या शिवा देवी महेश्वरी ।
नारायणाऽनुजा नम्रभूषणा नुतवैभवा ॥ ९॥

त्रिनेत्रा त्रिशिखा शम्भुसंश्रया शशिभूषणा ।
शूलहस्ता श्रुतधरा शुभदा शुभरूपिणी ॥ १०॥

उमा भगवती रात्रिः सोमसूर्याऽग्निलोचना ।
सोमसूर्यात्मताटङ्का सोमसूर्यकुचद्वयी ॥ ११॥

अम्बा अम्बिका अम्बुजधरा अम्बुरूपा आप्यायिनी स्थिरा ।
शिवप्रिया शिवाऽङ्कस्था शोभना शुम्भनाशिनी ॥ १२॥

खड्गहस्ता खगा खेटधरा खाऽच्छनिभाऽऽकृतिः ।
कौसुम्भाञ्चला कौसुम्भप्रिया कुन्दनिभद्विजा ॥ १३॥

काली कपालिनी क्रूरा करवालकरा क्रिया ।
काम्या कुमारी कुटिला कुमाराऽम्बा कुलेश्वरी ॥ १४॥

मृडानी मृगशावाक्षी मृदुदेहा मृगप्रिया ।
मृकण्डुपूजिता माध्वीप्रिया मातृगणेडिता ॥ १५॥

मातृका माधवी माद्यन्मानसा मदिरेक्षणा ।
मोदरूपा मोदकरी मुनिध्येया मनोन्मनी ॥ १६॥

पर्वतस्था पर्वपूज्या परमाऽर्थदा ।
परात्परा परामर्शमयी परिणताऽखिला ॥ १७॥

पाशिसेव्या पशुपतिप्रिया पशुवृषस्तुता ।
पश्यन्ती परचिद्रूपा परीवादहरा परा ॥ १८॥

सर्वज्ञा सर्वरूपा सा सम्पत्तिः सम्पदुन्नता ।
आपन्निवारिणी भक्तसुलभा करुणामयी ॥ १९॥

कलावती कलामूला कलाकलितविग्रहा ।
गणसेव्या गणेशाना गतिर्गमनवर्जिता ॥ २०॥

ईश्वरीशानदयिता शक्तिः शमितपातका ।
पीठगा पीठिकारूपा पृषत्पूज्या प्रभामयी ॥ २१॥

महामाया मतङ्गेष्टा लोकाऽलोका शिवाङ्गना ।

फलश्रुति

एतत्तेऽभिहितं राम स्तोत्रमत्यन्तदुर्लभम् ॥ २२॥

गौर्याष्टोत्तरशतनामभिः सुमनोहरम् ।
आपदम्भोधितरणे सुदृढप्लवरूपकम् ॥ २३॥

एतत् प्रपठतां नित्यमापदो यान्ति दूरतः ।
गौरीप्रसादजननमात्मज्ञानप्रदं नृणाम् ॥ २४॥

भक्त्या प्रपठतां पुंसां सिध्यत्यखिलमीहितम् ।
अन्ते कैवल्यमाप्नोति सत्यं ते भार्गवेरितम् ॥ २५॥

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

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