शतनाम · श्री गणेश

श्रीविघ्नेश्वराष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

श्री गणेश (विघ्नेश्वर) के एक सौ आठ नामों का स्तोत्र। फलश्रुति के अनुसार त्रिपुर-वध के लिए उद्यत भगवान शंकर ने इन्हीं नामों से अपने पुत्र विघ्नेश्वर की स्तुति की थी। दूर्वा, बिल्वपत्र, पुष्प और चन्दन-अक्षत से पूजा करते हुए इसके पाठ का विधान है।

अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र15 श्लोकफलश्रुति

पाठ से पहले — «ॐ» के विषय में

परम्परा के अनुसार «ॐ» (प्रणव) का उच्चारण यज्ञोपवीत संस्कार के बाद किया जाता है। जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है, वे पाठ में आए «ॐ» को छोड़कर, या उसके स्थान पर «नमः» कहकर पाठ आगे करते रहें — भाव और श्रद्धा से किया गया पाठ पूर्ण है।

आपका चुनाव इस फ़ोन में याद रहता है; पूरे पाठ में «ॐ» उसी के अनुसार दिखेगा।

यज्ञोपवीत संस्कार — न्यूनतम, श्रेष्ठ और अधिकतम आयु
वर्णन्यूनतम आयुश्रेष्ठ आयुअधिकतम आयु
ब्राह्मण5वाँ वर्ष8वाँ वर्ष16 वर्ष
क्षत्रिय6ठा वर्ष11वाँ वर्ष22 वर्ष
वैश्य8वाँ वर्ष12वाँ वर्ष24 वर्ष

(आयु की गणना गर्भ से की जाती है।)

न्यूनतम आयु — मनुस्मृति 2.37

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥

अर्थ: ब्रह्मतेज की इच्छा हो तो ब्राह्मण का 5वें वर्ष में, बल की इच्छा हो तो क्षत्रिय का 6ठे वर्ष में और धन-समृद्धि की इच्छा हो तो वैश्य का 8वें वर्ष में उपनयन करें।

श्रेष्ठ आयु — मनुस्मृति 2.36

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण का उपनयन गर्भ से 8वें वर्ष में, क्षत्रिय का 11वें वर्ष में और वैश्य का 12वें वर्ष में करना चाहिए।

अधिकतम आयु — मनुस्मृति 2.38

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते।
आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः॥

अर्थ: ब्राह्मण के लिए 16 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 22 वर्ष और वैश्य के लिए 24 वर्ष तक सावित्री का काल नहीं बीतता।

मनुस्मृति 2.39

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः॥

अर्थ: अधिकतम आयु के बाद भी जिनका संस्कार नहीं हुआ, वे सावित्री-पतित (व्रात्य) हो जाते हैं। उनके लिए प्रायश्चित्त (व्रात्य-स्तोम) करके ही उपनयन का विधान है।

(पारस्कर गृह्यसूत्र 2.5 और याज्ञवल्क्य स्मृति 1.37 में भी यही आयु-सीमाएँ बताई गई हैं।)

🙏 अपने बालक का यज्ञोपवीत संस्कार समय रहते कराएँ।

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स्तोत्र — अष्टोत्तरशतनाम

विनायको विघ्नराजो गौरीपुत्रो गणेश्वरः ।
स्कन्दाग्रजोऽव्ययः पूतो दक्षोऽध्यक्षो द्विजप्रियः ॥ १॥

अग्निगर्भच्छिदिन्द्रश्रीप्रदो वाणीप्रदोऽव्ययः ।
सर्वसिद्धिप्रदः शर्वतनयः शर्वरीप्रियः ॥ २॥

सर्वात्मकः सृष्टिकर्ता देवोऽनेकार्चितः शिवः ।
शुद्धो बुद्धिप्रियः शान्तो ब्रह्मचारी गजाननः ॥ ३॥

द्वैमात्रेयो मुनिस्तुत्यो भक्तविघ्नविनाशनः ।
एकदन्तश्चतुर्बाहुश्चतुरः शक्तिसंयुतः ॥ ४॥

लम्बोदरः शूर्पकर्णो हरिर्ब्रह्मविदुत्तमः ।
कालो ग्रहपतिः कामी सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ५॥

पाशाङ्कुशधरश्चण्डो गुणातीतो निरञ्जनः ।
अकल्मषः स्वयंसिद्धः सिद्धार्चितपदाम्बुजः ॥ ६॥

बीजपूरफलासक्तो वरदः शाश्वतः कृती ।
द्विजप्रियो वीतभयो गदी चक्रीक्षुचापधृत् ॥ ७॥

श्रीदोऽज उत्पलकरः श्रीपतिः स्तुतिहर्षितः ।
कुलाद्रिभेत्ता जटिलः कलिकल्मषनाशनः ॥ ८॥

चन्द्रचूडामणिः कान्तः पापहारी समाहितः ।
आश्रितश्रीकरः सौम्यो भक्तवाञ्छितदायकः ॥ ९॥

शान्तः कैवल्यसुखदः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
ज्ञानी दयायुतो दान्तो ब्रह्मद्वेषविवर्जितः ॥ १०॥

प्रमत्तदैत्यभयदः श्रीकण्ठो विबुधेश्वरः ।
रमार्चितो विधिर्नागराजयज्ञोपवीतवान् ॥ ११॥

स्थूलकण्ठः स्वयंकर्ता सामघोषप्रियः परः ।
स्थूलतुण्डोऽग्रणीर्धीरो वागीशः सिद्धिदायकः ॥ १२॥

दूर्वाबिल्वप्रियोऽव्यक्तमूर्तिरद्भुतमूर्तिमान् ।
शैलेन्द्रतनुजोत्सङ्गखेलनोत्सुकमानसः ॥ १३॥

स्वलावण्यसुधासारो जितमन्मथविग्रहः ।
समस्तजगदाधारो मायी मूषकवाहनः ॥ १४॥

हृष्टस्तुष्टः प्रसन्नात्मा सर्वसिद्धिप्रदायकः ।
अष्टोत्तरशतेनैवं नाम्नां विघ्नेश्वरं विभुम् ॥ १५॥

फलश्रुति

तुष्टाव शङ्करः पुत्रं त्रिपुरं हन्तुमुद्यतः ।
यः पूजयेदनेनैव भक्त्या सिद्धिविनायकम् ॥ १६॥

दूर्वादलैर्बिल्वपत्रैः पुष्पैर्वा चन्दनाक्षतैः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वविघ्नैः प्रमुच्यते ॥ १७॥

॥ इति श्रीभविष्योत्तरपुराणे विघ्नेश्वराष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ इति ॥

पाठ सम्पन्न हुआ। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

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