श्राद्ध क्या है? श्राद्ध के प्रकार — नित्य, मासिक, काम्य, सपिण्डीकरण और पार्वण

AI Summary · लेख सार

श्रद्धा से जो कर्म किया जाए, उसका नाम श्राद्ध है — और वह श्रद्धा सात्त्विक होनी चाहिए। आजकल लोग केवल पितृपक्ष को ही श्राद्ध मान लेते हैं, पर शास्त्र में श्राद्ध के कई प्रकार हैं: रोज़ होने वाला नित्य श्राद्ध, हर अमावस्या का श्राद्ध, किसी कामना से किया जाने वाला काम्य श्राद्ध, मृत्यु के बाद होने वाला सपिण्डीकरण, और पितृपक्ष का पार्वण श्राद्ध। इन सबका अपना स्थान है।

पितृपक्ष में क्या करें और क्या न करें? श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान की पूरी विधि — वीडियो वीडियो · 0:25 सेपितृपक्ष में क्या करें और क्या न करें? श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान की पूरी विधिYouTube पर देखिए →

Key Takeaways · मुख्य बिंदु

  • श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध है — श्रद्धा सात्त्विक हो
  • श्राद्ध केवल पितृपक्ष तक सीमित नहीं है
  • अमावस्या का श्राद्ध पितरों तक एक महीने तक पहुँचता रहता है
  • सपिण्डीकरण के बाद ही दिवंगत पितृ-पंक्ति में जाते हैं
  • श्राद्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही किया जाता है

श्राद्ध का अर्थ

डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा बताते हैं — जो श्रद्धा से किया जाए, उसका नाम श्राद्ध है।

पर श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है — सात्त्विक, राजस और तामस। जिस श्रद्धा में सत्त्व मिला हो, उस सात्त्विक श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। दिखावे के लिए, या डर से किया गया कर्म वह फल नहीं देता।

क्या श्राद्ध केवल पितृपक्ष में होता है?

नहीं। आज अधिकांश लोग पितृपक्ष को ही श्राद्ध मानने लगे हैं, पर पहले लोग हर महीने श्राद्ध करते थे।

इसका कारण वे यह बताते हैं कि हमारा एक महीना पितरों का एक दिन-रात होता है। इसलिए अमावस्या के दिन यदि आपने गौ या ब्राह्मण को भोजन कराया, तर्पण किया, तो वह एक महीने तक पितरों तक अपने-आप पहुँचता रहता है।

श्राद्ध के प्रकार

प्रकारकबक्या है
नित्य श्राद्धप्रतिदिनजैसे नित्य भोजन है, वैसे नित्य श्राद्ध है। इसकी संक्षिप्त विधि नित्य-कर्म-पद्धति में दी है।
अमावस्या श्राद्धहर महीनेश्राद्ध की अमावस्या को — एक महीने तक पितरों तक पहुँचता है।
नैमित्तिक श्राद्धकिसी निमित्त सेकिसी विशेष अवसर या कारण को लेकर।
काम्य श्राद्धकिसी कामना सेजैसे सन्तान की इच्छा — इसमें मध्यम पिण्ड का विशेष विधान बताया गया है।
सपिण्डीकरणमृत्यु के 11वें–12वें दिनदिवंगत को पितृ-पंक्ति में मिलाने का कर्म।
पार्वण श्राद्धपितृपक्षकन्या राशि में सूर्य के समय का वार्षिक श्राद्ध।

सपिण्डीकरण क्यों ज़रूरी है

मृत्यु के बाद दस दिन मलिन षोडशी और दशगात्र होते हैं, फिर 11वें–12वें दिन सपिण्डीकरण।

जब तक सपिण्डीकरण नहीं होता, तब तक संकल्प में "प्रेत" शब्द बोला जाता है। सपिण्डीकरण के बाद दिवंगत पितृ-पंक्ति में — यानी पिता, दादा, परदादा के साथ — बैठाए जाते हैं। इसी के बाद उनके लिए भोजन कराने की पात्रता आती है।

डॉ. शर्मा एक बात पर विशेष ज़ोर देते हैं: दशगात्र ही सबका आधार है। कई लोग दस दिन के कर्म नहीं करते। यदि आधार ही नहीं हुआ, तो आगे पितृपक्ष में कुछ भी कीजिए, वह वस्तु वहाँ तक नहीं पहुँचती।

पितृपक्ष क्यों

वर्ष में जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं — इसे "कन्यागत सूर्य" कहा गया, जो आज की बोली में "कनागत" हो गया — तब पितर भूमण्डल पर आते हैं और अपने-अपने घर पहुँचते हैं।

सामर्थ्य न हो तो?

यह सबसे ज़रूरी बात है। श्राद्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है। यदि कुछ भी सामर्थ्य न हो, तो हाथ उठाकर इतना कह दीजिए —

"हे मेरे पितरो, हे पूर्वजो, मेरे पास कुछ नहीं है। मैं आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।"

इससे भी पितर प्रसन्न होकर जाते हैं। श्राद्ध का आधार धन नहीं, श्रद्धा है।

इस विषय पर विस्तार से पढ़ना हो तो डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा की पुस्तक पितृ-कर्म श्राद्ध-मीमांसा देखिए, और पितृपक्ष की पूरी मार्गदर्शिका यहाँ है।

*स्रोत — यह लेख डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा की वीडियो-चर्चा पर आधारित है (ऊपर वीडियो की कड़ी)। श्राद्ध की तिथि और मुहूर्त हर वर्ष बदलते हैं — अपने पंचांग और कुल-पुरोहित से मिलाकर ही तय कीजिए।*

यह पूरी बात डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा से सुनिएवीडियो में 0:25 से · YouTube पर

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्राद्ध किसे कहते हैं? +

जो कर्म सात्त्विक श्रद्धा से किया जाए, उसे श्राद्ध कहते हैं। डॉ. ज्ञानेन्द्र शर्मा के अनुसार श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विक, राजस और तामस — और सात्त्विक श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध है।

श्राद्ध कितने प्रकार के होते हैं? +

मुख्य रूप से नित्य श्राद्ध (प्रतिदिन), अमावस्या का श्राद्ध (मासिक), नैमित्तिक श्राद्ध (किसी निमित्त से), काम्य श्राद्ध (किसी कामना से), सपिण्डीकरण (मृत्यु के बाद) और पार्वण श्राद्ध (पितृपक्ष में)।

अमावस्या को श्राद्ध क्यों किया जाता है? +

क्योंकि हमारा एक महीना पितरों का एक दिन-रात होता है। अमावस्या को किया गया श्राद्ध और तर्पण एक महीने तक पितरों तक पहुँचता रहता है।

सामर्थ्य न हो तो श्राद्ध कैसे करें? +

श्राद्ध सामर्थ्य के अनुसार ही किया जाता है। कुछ भी न हो तो हाथ उठाकर पितरों को प्रणाम करते हुए कह दीजिए कि मेरे पास कुछ नहीं है — इससे भी वे प्रसन्न होते हैं।