आरती · हनुमान जी

आरती कीजै हनुमान लला की

हनुमान चालीसा के बाद प्रायः गाई जाने वाली श्री हनुमान जी की आरती।

आरती12 पदविशेष: मंगलवार, शनिवार, हनुमान जयन्ती

आरती

दीप जलाइए, आरती गाइए

«आरती आरम्भ करें» दबाने पर थाली घूमने लगती है और हर कुछ क्षण में घण्टी बजती है — आप साथ में आरती गाइए। चाहें तो केवल घण्टी भी बजा सकते हैं।

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आरती

आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट रघुनाथ कला की॥

भावार्थहनुमान जी की आरती कीजिए, जो दुष्टों का दमन करने वाले और श्री रघुनाथ जी की शक्ति के अंश हैं।

जाके बल से गिरिवर काँपे।
रोग दोष जाके निकट न झाँके॥

भावार्थजिनके बल से पर्वत भी काँप जाते हैं और रोग-दोष जिनके पास तक नहीं आते।

अंजनि पुत्र महा बलदाई।
सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥

भावार्थअंजनी के पुत्र महान बल देने वाले हैं और सदा सन्तों के सहायक हैं।

दे रघुनाथ पठाए।
लंका जारि सिया सुधि लाए॥

भावार्थश्री रघुनाथ जी ने बीड़ा देकर उन्हें भेजा; उन्होंने लंका जलाई और सीता जी का समाचार लाए।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥

भावार्थलंका जैसा किला और समुद्र जैसी खाई — पवनपुत्र को उसे पार करने में देर न लगी।

लंका जारि असुर संहारे।
सियारामजी के काज ॥

भावार्थलंका जलाकर असुरों का संहार किया और सीता-राम जी के कार्य सँवारे।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े ।
आनि प्राण उबारे॥

भावार्थलक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे, तब संजीवनी लाकर उनके प्राण बचाए।

पैठि पाताल तोरि कारे।
अहिरावण की भुजा ॥

भावार्थपाताल में घुसकर यम के समान अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ दीं।

बाएँ भुजा असुर दल मारे।
दाहिने भुजा सन्तजन तारे॥

भावार्थबाईं भुजा से असुरों के दल को मारा और दाहिनी भुजा से सन्तों को तारा।

नर मुनि आरती उतारें।
जय जय जय हनुमान उचारें॥

भावार्थदेवता, मनुष्य और मुनि आरती उतारते हैं और «जय जय जय हनुमान» का उच्चारण करते हैं।

कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजना माई॥

भावार्थसोने के थाल में कपूर की लौ फैली है और माता अंजनी आरती कर रही हैं।

जो हनुमानजी की आरती गावे।
बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥

भावार्थजो हनुमान जी की आरती गाता है, वह वैकुण्ठ में वास पाकर परमपद प्राप्त करता है।

॥ इति ॥

आरती सम्पन्न हुई। भगवान के चरणों में पुष्प अर्पित कीजिए।

पाठ शान्त मन और स्पष्ट उच्चारण से करें; भावार्थ समझकर पढ़ने से मन अधिक लगता है। पाठ में आई फलश्रुति कवि की श्रद्धा और परम्परा की आस्था है — इसे किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में न लें।

भावार्थ सरल हिन्दी में, अर्थ समझाने के लिए है।

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