दोहा
जय गणपति सद्गुण सदन, कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
भावार्थहे गणपति! आप सद्गुणों के धाम, कवियों में श्रेष्ठ मुख वाले और कृपालु हैं। विघ्न हरने और मंगल करने वाले पार्वतीनन्दन! आपकी जय हो।
चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
भावार्थहे गणों के राजा गणपति! आपकी जय हो; आप मंगल से भरते हैं और शुभ कार्य सिद्ध करते हैं।
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
भावार्थहे गजमुख, सुख के धाम और सुख देने वाले! आप विश्व के विनायक और बुद्धि के विधाता हैं।
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक मन भावन॥
भावार्थआपकी टेढ़ी सूँड़ पवित्र और सुहावनी है; माथे पर त्रिपुण्ड तिलक मन को भाता है।
राजित मणि मुक्तन माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
भावार्थआपके वक्ष पर मणियों और मोतियों की माला है, सिर पर सोने का मुकुट और नेत्र विशाल हैं।
पुस्तक त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
भावार्थआपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगन्धित फूल प्रिय हैं।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
भावार्थआपके शरीर पर सुन्दर पीताम्बर है; आपकी चरण-पादुकाएँ मुनियों के मन में बसती हैं।
धनि शिवसुवन भ्राता।
गौरी विश्व-विख्याता॥
भावार्थहे शिवपुत्र, कार्तिकेय के भाई, गौरी के लाड़ले! आप धन्य हैं और विश्व-विख्यात हैं।
ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
भावार्थऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं; द्वार पर आपका वाहन मूषक शोभा देता है।
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
भावार्थअब मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यन्त पवित्र और मंगलकारी है।
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भावार्थएक समय हिमालय की पुत्री पार्वती जी ने पुत्र की कामना से भारी तप किया।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुँच्यो तुम धरि रूपा॥
भावार्थजब वह अनुपम यज्ञ पूरा हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ पहुँचे।
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
भावार्थअतिथि जानकर गौरी जी प्रसन्न हुईं और अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
भावार्थअत्यन्त प्रसन्न होकर आपने वर दिया — हे माता! आपने पुत्र के लिए जो तप किया है…
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
भावार्थ…उससे आपको विशाल बुद्धि वाला पुत्र इसी समय, बिना गर्भ धारण किए मिलेगा।
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
भावार्थवह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भण्डार होगा और भगवान के रूप में सबसे पहले पूजा जाएगा।
अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।
पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
भावार्थऐसा कहकर आप अन्तर्धान हो गए और पालने में बालक के रूप में प्रकट हुए।
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
भावार्थजब आप शिशु बनकर रोने लगे, तो आपका मुख देखकर गौरी जी के आनन्द की सीमा न रही।
सकल मगन सुखमंगल गावहिं।
नभ ते वर्षावहिं॥
भावार्थसब आनन्द में मग्न होकर मंगल गीत गाने लगे और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।
शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं।
मुनिजन सुत देखन आवहिं॥
भावार्थशिव-पार्वती ने बहुत दान दिया; देवता और मुनि बालक को देखने आने लगे।
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥
भावार्थयह आनन्द-मंगल देखकर शनिदेव भी बालक को देखने आए।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
भावार्थअपनी दृष्टि के प्रभाव को सोचकर शनिदेव मन में बालक को देखना नहीं चाहते थे।
कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
भावार्थपार्वती जी के मन में कुछ खेद हुआ — «शनि! क्या मेरा उत्सव तुम्हें अच्छा नहीं लगा?»
कहन लगे शनि मन सकुचाई।
का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥
भावार्थशनिदेव सकुचाकर बोले — «बालक को मुझे दिखाकर क्या करेंगी?»
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥
भावार्थपार्वती जी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने को कहा।
पड़तहिं शनि कोण प्रकाशा।
बालक शिर इड़ि गयो आकाशा॥
भावार्थशनि की दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर आकाश में उड़ गया।
गिरीं विकल ह्वै धरणी।
सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥
भावार्थपार्वती जी व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख का वर्णन नहीं हो सकता।
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्ह्यो लखि सुत को नाशा॥
भावार्थकैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर पुत्र का नाश कर दिया।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
भावार्थतुरन्त भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से हाथी का सिर काटकर ले आए।
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
भावार्थउन्होंने वह सिर बालक के धड़ पर रखा और शंकर जी ने मन्त्र पढ़कर प्राण डाल दिए।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
भावार्थतब शिवजी ने आपका नाम गणेश रखा और बुद्धि के भण्डार व प्रथम पूज्य होने का वर दिया।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥
भावार्थजब शिवजी ने बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा की शर्त रखी…
चले भरमि भुलाई।
रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
भावार्थ…तो कार्तिकेय भ्रम में पड़कर (परिक्रमा को) चल दिए, और आपने बैठे-बैठे बुद्धि से उपाय सोचा।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
भावार्थआपने माता-पिता के चरण पकड़े और उनकी सात परिक्रमाएँ कर लीं।
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते बहु बरसे॥
भावार्थ«धन्य गणेश!» कहकर शिवजी का हृदय हर्षित हुआ और आकाश से देवताओं ने बहुत फूल बरसाए।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष मुख सकै न गाई॥
भावार्थआपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई हज़ार मुख वाले शेषनाग भी नहीं गा सकते।
मैं मति हीन मलीन दुखारी।
करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भावार्थमैं बुद्धिहीन, मलिन और दुःखी हूँ — किस प्रकार आपकी विनती करूँ?
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
भावार्थप्रभु के दास रामसुन्दर आपका भजन करते हैं (इस पंक्ति में रचयिता का परिचय है)।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कछु दीजै॥
भावार्थहे प्रभु! अब इस दीन पर दया कीजिए और अपनी थोड़ी शक्ति और भक्ति दीजिए।
दोहा
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धरि ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
भावार्थजो ध्यान लगाकर श्री गणेश चालीसा का पाठ करता है, उसके घर में नित्य नया मंगल बसता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।
सम्बत अपन दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
भावार्थयह चालीसा ऋषि पंचमी के दिन पूर्ण हुई (रचना-काल का संकेत) — मंगलमूर्ति गणेश जी की जय।
