AI Summary · लेख सार

सूर्य को अर्घ्य देना सबसे सरल नित्य-कर्मों में है — इसमें न कोई ख़र्च है, न कोई सामग्री। पर इसमें कुछ नियम हैं जो प्रायः नहीं बताए जाते: पात्र कौन-सा हो, जल में क्या डाला जाए, धारा कहाँ गिरे, और वह जल पैरों के नीचे क्यों नहीं आना चाहिए। नीचे पूरी विधि दी गई है।

Key Takeaways · मुख्य बिंदु

  • ताम्र पात्र से अर्घ्य देने का विधान है
  • सूर्योदय के बाद लगभग एक घंटे के भीतर उत्तम
  • जल में लाल पुष्प, अक्षत और रोली डाली जाती है
  • अर्घ्य का जल पैरों के नीचे नहीं आना चाहिए
  • यह नित्य-कर्म है — ख़र्च कुछ नहीं, नियम सब कुछ

सामग्री

  • ताम्र (ताँबे) का पात्र — यही विधान है
  • शुद्ध जल
  • लाल पुष्प, अक्षत (साबुत चावल), रोली या लाल चन्दन

विधि — क्रम से

  1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनिए। अर्घ्य स्नान के बाद ही दिया जाता है।
  2. ताम्र पात्र में शुद्ध जल भरिए।
  3. उसमें लाल पुष्प, अक्षत और थोड़ी रोली डालिए।
  4. पूर्व दिशा की ओर मुख करके, दोनों हाथों से पात्र को सिर के ऊपर उठाइए।
  5. जल की पतली धारा धीरे-धीरे गिराइए। धारा के बीच से सूर्य का दर्शन कीजिए — यही इस कर्म का मर्म है।
  6. साथ-साथ मंत्र का जप कीजिए।
  7. तीन बार अर्घ्य देने का विधान है।
  8. अंत में वहीं खड़े रहकर परिक्रमा कीजिए और प्रणाम।

मंत्र

जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

अर्थ — जो जपा-पुष्प के समान कांतिवाले हैं, कश्यप के वंशज हैं, महान तेजवाले हैं, अंधकार के शत्रु और सब पापों को हरने वाले हैं — उन दिवाकर (सूर्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।

अन्य मंत्र —

  • ॐ सूर्याय नमः
  • ॐ घृणिः सूर्याय नमः
  • ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः (बीज मंत्र)

सही समय

  • सूर्योदय के बाद लगभग एक घंटे के भीतर — यही उत्तम काल कहा गया है।
  • सूर्य ऊपर चढ़ जाने के बाद अर्घ्य का विधान नहीं है।
  • बादल हों और सूर्य न दिखे, तो भी पूर्व दिशा की ओर अर्घ्य दिया जा सकता है।

जो भूलें प्रायः होती हैं

  • जल पैरों के नीचे आ जाना। अर्घ्य का जल पवित्र है — उस पर पैर नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए ऐसे स्थान पर खड़े होइए जहाँ जल आगे की ओर बह जाए, या किसी पौधे की ओर।
  • स्टील या प्लास्टिक का पात्र। विधान ताम्र पात्र का है।
  • धारा मोटी गिराना। धारा पतली होनी चाहिए ताकि उसमें से सूर्य दिखाई दे।
  • बिना स्नान किए। यह नित्य-कर्म स्नान के बाद ही होता है।
  • नियम तोड़ना। आरम्भ किया है तो नित्य दीजिए। छोड़-छोड़कर करने से क्रम बनता ही नहीं।

किन्हें विशेष

परम्परा में सूर्य को पिता, यश, स्वास्थ्य और आत्मबल का कारक कहा गया है। जिनकी कुंडली में सूर्य से सम्बन्धित विषय हों, उनके लिए यह नित्य-कर्म विशेष कहा जाता है — और इसमें कोई ख़र्च नहीं, इसलिए यह सबके लिए सुलभ है।

यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।

*स्रोत — ध्यान-श्लोक व्यास-कृत नवग्रह स्तोत्र से; अर्घ्य की विधि पारम्परिक नित्य-कर्म-पद्धति के अनुसार।*

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सूर्य को अर्घ्य किस पात्र से दें? +

ताँबे के पात्र से। जल में लाल पुष्प, अक्षत और थोड़ी रोली डाली जाती है।

सूर्य को अर्घ्य देने का सही समय क्या है? +

सूर्योदय के बाद लगभग एक घंटे के भीतर। सूर्य ऊपर चढ़ जाने के बाद अर्घ्य का विधान नहीं है। बादल हों तो भी पूर्व दिशा की ओर अर्घ्य दिया जा सकता है।

अर्घ्य का जल पैरों पर आ जाए तो? +

ऐसा नहीं होना चाहिए। अर्घ्य का जल पवित्र माना जाता है, इसलिए ऐसे स्थान पर खड़े होना चाहिए जहाँ जल आगे की ओर बह जाए या किसी पौधे की ओर चला जाए।

अर्घ्य कितनी बार देना चाहिए? +

तीन बार देने का विधान है। जल की पतली धारा गिराते हुए उसके बीच से सूर्य का दर्शन किया जाता है — यही इस कर्म का मुख्य भाव है।