AI Summary · लेख सार
सोमवार शिव का दिन है। जलाभिषेक इस उपासना का सबसे सरल और सबसे प्रचलित अंग है। नीचे उसकी पूरी विधि दी गई है — सामग्री, क्रम, बेलपत्र चढ़ाने का नियम, कौन-सी वस्तुएँ शिव को नहीं चढ़तीं, मंत्र, और परिक्रमा का वह नियम जो प्रायः नहीं बताया जाता।
Key Takeaways · मुख्य बिंदु
- जलाभिषेक की धारा पतली और अटूट रखी जाती है
- बेलपत्र उल्टा, यानी चिकनी ओर से, चढ़ाया जाता है
- शिव को केतकी का पुष्प और हल्दी नहीं चढ़ती
- शिवलिंग की परिक्रमा पूरी नहीं, आधी की जाती है
- पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय सबसे सुलभ है
सामग्री
- जल — गंगाजल हो तो उत्तम, अन्यथा शुद्ध जल
- दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत के लिए)
- बेलपत्र, धतूरा, आक का पुष्प, भाँग
- सफ़ेद चन्दन, अक्षत, सफ़ेद पुष्प
- धूप, दीप, कपूर
- भस्म
विधि — क्रम से
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनिए। शिव-पूजा में श्वेत वस्त्र प्रिय कहा गया है।
- उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठिए।
- शिवलिंग या शिव-चित्र के सामने दीपक जलाइए।
- जलाभिषेक — पात्र से जल की पतली, अटूट धारा शिवलिंग पर गिराइए। धारा टूटनी नहीं चाहिए। साथ-साथ मंत्र का जप चलता रहे।
- चाहें तो पंचामृत से अभिषेक कीजिए — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर। इसके बाद फिर शुद्ध जल से।
- भस्म या चन्दन का त्रिपुण्ड लगाइए।
- बेलपत्र चढ़ाइए — नीचे उसका नियम दिया है।
- धतूरा, आक का पुष्प और सफ़ेद पुष्प अर्पित कीजिए।
- धूप-दीप दिखाकर मंत्र-जप कीजिए, फिर आरती।
बेलपत्र का नियम
- तीन पत्तियों वाला बेलपत्र लीजिए। पत्तियाँ कटी-फटी न हों।
- उल्टा चढ़ाया जाता है — यानी चिकनी सतह शिवलिंग की ओर।
- डंठल अपनी ओर रहता है।
- बेलपत्र बासी नहीं माना जाता — धोकर दोबारा चढ़ाया जा सकता है।
- चतुर्दशी और अमावस्या को बेलपत्र तोड़ना वर्जित कहा गया है; एक दिन पहले तोड़कर रख लीजिए।
जो शिव को नहीं चढ़ता
| वस्तु | कारण (परम्परा में) |
|---|---|
| केतकी का पुष्प | शिव-पुराण की कथा के अनुसार यह वर्जित है |
| हल्दी | हल्दी सौभाग्य और स्त्री-तत्त्व से जुड़ी है |
| तुलसी | तुलसी विष्णु को अर्पित होती है |
| नारियल का जल | अभिषेक में इसका निषेध कहा गया है |
| शंख से जल | शिव-पूजा में शंख का प्रयोग नहीं होता |
मंत्र
- पंचाक्षर — ॐ नमः शिवाय
- रुद्र मंत्र — ॐ नमो भगवते रुद्राय
- महामृत्युंजय — ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
परिक्रमा का नियम
यह वह बात है जो प्रायः नहीं बताई जाती।
शिवलिंग की परिक्रमा पूरी नहीं की जाती। जलहरी — जिससे अभिषेक का जल बाहर निकलता है — उसे लाँघा नहीं जाता। इसलिए परिक्रमा बाईं ओर से चलकर जलहरी तक जाती है, वहाँ से लौटकर दूसरी ओर से फिर जलहरी तक। इसे अर्ध-परिक्रमा या सोम-सूत्र परिक्रमा कहते हैं।
सोमवार व्रत
- एक समय भोजन, या फलाहार।
- सोलह सोमवार का व्रत विशेष प्रचलित है।
- व्रत आरम्भ करने से पहले संकल्प लीजिए और उसे निभाइए — बीच में छोड़ देना ठीक नहीं माना जाता।
यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।
*स्रोत — पूजा-क्रम, बेलपत्र का नियम और अर्ध-परिक्रमा का विधान पारम्परिक कर्मकाण्ड-पद्धति तथा शिव-पुराण की परम्परा के अनुसार। व्रत की तिथि अपने पंचांग से मिलाकर तय कीजिए।*
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आचार्य जी से परामर्श बुक करेंअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शिवलिंग पर जल कैसे चढ़ाएँ? +
जल की पतली और अटूट धारा शिवलिंग पर गिरनी चाहिए — धारा टूटनी नहीं चाहिए। साथ-साथ मंत्र का जप चलता रहे। गंगाजल हो तो उत्तम, अन्यथा शुद्ध जल।
बेलपत्र किस ओर से चढ़ाया जाता है? +
उल्टा, यानी चिकनी सतह शिवलिंग की ओर और डंठल अपनी ओर। तीन पत्तियों वाला बेलपत्र लिया जाता है और पत्तियाँ कटी-फटी नहीं होनी चाहिए।
शिव जी को क्या नहीं चढ़ाना चाहिए? +
केतकी का पुष्प, हल्दी, तुलसी और नारियल का जल। शिव-पूजा में शंख से जल चढ़ाने का भी निषेध कहा गया है।
क्या शिवलिंग की पूरी परिक्रमा करनी चाहिए? +
नहीं। जलहरी, जिससे अभिषेक का जल बाहर निकलता है, उसे लाँघा नहीं जाता। इसलिए अर्ध-परिक्रमा की जाती है — बाईं ओर से जलहरी तक जाकर लौटना, फिर दूसरी ओर से जलहरी तक।
ॐ