AI Summary · लेख सार
राहु और केतु छाया-ग्रह कहे जाते हैं — इनका कोई पिण्ड नहीं, ये गणितीय बिन्दु हैं। फिर भी फलित में इनका स्थान बड़ा है, विशेषकर दशा-अन्तर्दशा में। नीचे दोनों के ध्यान-श्लोक, बीज मंत्र, जप-संख्या, दान की वस्तुएँ और शास्त्रोक्त उपाय दिए गए हैं।
Key Takeaways · मुख्य बिंदु
- राहु-केतु छाया ग्रह हैं — इनका कोई पिण्ड नहीं
- राहु का जप 18,000 और केतु का 17,000 बताया गया है
- राहु का दान शनिवार, केतु का मंगलवार या शनिवार को
- दोनों की दृष्टि जिस भाव पर हो, वह भाव देखा जाता है
- इनके नाम पर भय फैलाना शास्त्र-सम्मत नहीं
ये हैं क्या
राहु और केतु छाया-ग्रह कहे जाते हैं। इनका कोई पिण्ड नहीं होता — ये वे बिन्दु हैं जहाँ चन्द्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को काटता है। राहु उत्तर बिन्दु है, केतु दक्षिण।
दोनों सदा एक-दूसरे से सातवें भाव में रहते हैं और सदा वक्री चलते हैं।
फलित में राहु को आकांक्षा, विदेश, तकनीक और अचानक होने वाली घटनाओं से, तथा केतु को वैराग्य, मोक्ष, शोध और सूक्ष्म बुद्धि से जोड़ा जाता है।
राहु का ध्यान-श्लोक
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ॥
अर्थ — आधे शरीर वाले, महान पराक्रमी, चन्द्र और सूर्य का मर्दन करने वाले, सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।
केतु का ध्यान-श्लोक
पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ॥
अर्थ — पलाश-पुष्प के समान वर्ण वाले, तारा-ग्रहों के मस्तक-स्वरूप, रौद्र स्वभाव वाले उन केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।
मंत्र, जप और दान
| राहु | केतु | |
|---|---|---|
| बीज मंत्र | ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः | ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः |
| सामान्य मंत्र | ॐ रां राहवे नमः | ॐ कें केतवे नमः |
| जप-संख्या | 18,000 | 17,000 |
| दान का दिन | शनिवार | मंगलवार या शनिवार |
| दान की वस्तुएँ | तिल, नारियल, कम्बल, गोमेद | तिल, सप्तधान्य, कम्बल, लहसुनिया |
जप पूरा होने पर दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और उसका दशांश ब्राह्मण-भोजन — तब अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है।
शास्त्रोक्त उपाय
- दुर्गा-उपासना — राहु के लिए देवी की उपासना विशेष कही गई है।
- गणेश-उपासना — केतु के लिए। केतु को गणेश से जोड़ने की परम्परा है।
- महामृत्युंजय जप — जहाँ स्वास्थ्य या भय का विषय हो।
- तर्पण — राहु-केतु का सम्बन्ध पितृ-पक्ष से माना जाता है, इसलिए पितृ-तर्पण इनका सामान्य उपाय है।
- नारियल — राहु के निमित्त नारियल का दान या जल में प्रवाह।
- कम्बल का दान — दोनों के लिए, ज़रूरतमंद को।
- कुत्ते को रोटी — केतु के निमित्त प्रचलित।
- सेवा — कुष्ठ-रोगियों और असहाय की सेवा इन दोनों ग्रहों के लिए शास्त्र में बताई गई है।
दशा में क्या ध्यान रखें
राहु की महादशा 18 वर्ष और केतु की 7 वर्ष की होती है। ये लम्बी अवधियाँ हैं, इसलिए —
- पूरी दशा एक जैसी नहीं रहती; अन्तर्दशा के अनुसार बदलती है।
- हर राहु-दशा कष्टकारी नहीं होती। यदि राहु कुंडली में शुभ स्थिति में है, तो यही काल बड़ी उन्नति का होता है।
- उपाय दशा आरम्भ होने पर नहीं, उससे पहले आरम्भ करने की परम्परा है।
एक साफ़ बात
राहु-केतु के नाम पर जितना भय फैलाया जाता है, उसका आधार शास्त्र में नहीं है। ये भी नवग्रहों में हैं और इनका भी शुभ फल होता है। किसी के डराने पर उपाय मत कीजिए — कुंडली देखकर कीजिए।
यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।
*स्रोत — ग्रह-ध्यान के श्लोक व्यास-कृत नवग्रह स्तोत्र से; विधि और दान-क्रम पारम्परिक कर्मकाण्ड-पद्धति के अनुसार। किसी भी अनुष्ठान की तिथि और मुहूर्त अपने पंचांग से मिलाकर ही निश्चित कीजिए।*
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आचार्य जी से परामर्श बुक करेंअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
राहु और केतु क्या हैं? +
ये छाया-ग्रह हैं। इनका कोई पिण्ड नहीं होता — ये वे बिन्दु हैं जहाँ चन्द्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को काटता है। राहु उत्तर बिन्दु है और केतु दक्षिण। दोनों सदा एक-दूसरे से सातवें भाव में रहते हैं और सदा वक्री चलते हैं।
राहु-केतु के मंत्र का कितना जप करें? +
शास्त्र में राहु के लिए 18,000 और केतु के लिए 17,000 जप बताया गया है। पूर्ण होने पर दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन का विधान है।
राहु-केतु का दान किस दिन करें? +
राहु का दान शनिवार को — तिल, नारियल, कम्बल और गोमेद। केतु का दान मंगलवार या शनिवार को — तिल, सप्तधान्य, कम्बल और लहसुनिया।
क्या राहु की दशा हमेशा बुरी होती है? +
नहीं। राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है और वह पूरी एक जैसी नहीं रहती। यदि राहु कुंडली में शुभ स्थिति में है तो यही काल बड़ी उन्नति का सिद्ध होता है। यह कुंडली देखकर ही तय होता है।
ॐ