AI Summary · लेख सार

ग्रह-शान्ति के तीन अंग हैं — जप, दान और हवन। नीचे नौ ग्रहों की पूरी तालिका दी गई है: किस ग्रह का दान किस दिन, कौन-सी वस्तुएँ, और शास्त्र में बताई गई जप-संख्या। साथ में सबके बीज मंत्र, दान करने का सही तरीक़ा, और वे भूलें जो प्रायः हो जाती हैं।

Key Takeaways · मुख्य बिंदु

  • दान वहाँ जाए जहाँ उसकी वास्तव में आवश्यकता हो — यही दान की शर्त है
  • हर ग्रह का अपना दिन, अपनी वस्तु और अपनी जप-संख्या है
  • जप पूरा होने पर दशांश हवन का विधान है
  • दान दिखावे के लिए नहीं होता — शास्त्र में इसे निष्फल कहा गया है
  • कुंडली देखे बिना रत्न या दान तय करना उचित नहीं

ग्रह-शान्ति के तीन अंग बताए गए हैं — जप, दान और हवन। इनमें दान सबसे सुलभ है, इसलिए सबसे अधिक किया जाता है और सबसे अधिक ग़लत भी किया जाता है।

पूरी तालिका

ग्रहदिनदान की वस्तुएँजप
सूर्यरविवारगेहूँ, गुड़, ताँबा, लाल वस्त्र, माणिक्य7,000
चन्द्रसोमवारचावल, दूध, सफ़ेद वस्त्र, चाँदी, मोती11,000
मंगलमंगलवारमसूर की दाल, लाल वस्त्र, ताँबा, मूँगा10,000
बुधबुधवारमूँग, हरा वस्त्र, काँसा, पन्ना9,000
बृहस्पतिगुरुवारचने की दाल, हल्दी, पीला वस्त्र, पुखराज19,000
शुक्रशुक्रवारचावल, मिश्री, सफ़ेद वस्त्र, चाँदी, हीरा16,000
शनिशनिवारउड़द, तिल, सरसों का तेल, काला वस्त्र, लोहा23,000
राहुशनिवारतिल, नारियल, कम्बल, गोमेद18,000
केतुमंगलवार या शनिवारतिल, सप्तधान्य, कम्बल, लहसुनिया17,000

बीज मंत्र

  • सूर्य — ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
  • चन्द्र — ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः
  • मंगल — ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
  • बुध — ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
  • बृहस्पति — ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
  • शुक्र — ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
  • शनि — ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
  • राहु — ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
  • केतु — ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः

दान का सही तरीक़ा

  1. पात्र देखिए। दान उसे दिया जाता है जिसे उसकी आवश्यकता है। सम्पन्न व्यक्ति को तेल या अन्न देना दान नहीं कहलाता।
  2. दिन का ध्यान रखिए। ऊपर की तालिका में हर ग्रह का दिन दिया है।
  3. चुपचाप। शास्त्र में कहा गया है कि दिखावे के लिए किया दान फल नहीं देता।
  4. संकल्प लेकर। किस ग्रह के निमित्त दान कर रहे हैं, यह मन में स्पष्ट रखिए।
  5. अपने हाथ से। जहाँ सम्भव हो, दान स्वयं दीजिए।

जो भूलें प्रायः होती हैं

  • बिना कुंडली देखे दान। यदि कोई ग्रह आपकी कुंडली में शुभ है, तो उसका दान करके आप उसे ही कमज़ोर कर सकते हैं। यह सबसे बड़ी भूल है।
  • रत्न और दान एक साथ। किसी ग्रह का रत्न धारण करना और उसी का दान करना — दोनों उल्टी दिशा के काम हैं।
  • एक दिन में सब कुछ। नौ ग्रहों का दान एक ही दिन कर देने से कुछ नहीं होता। हर ग्रह का अपना दिन है।
  • बची हुई या ख़राब वस्तु। जो स्वयं काम की नहीं, वह दान में नहीं जाती।

जप का क्रम

तालिका में दी गई संख्या पूरी करने के बाद —

  • उसका दशांश हवन
  • हवन का दशांश तर्पण
  • तर्पण का दशांश मार्जन
  • और उसका दशांश ब्राह्मण-भोजन

तब अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है। इसीलिए बड़ी संख्या का जप विधिपूर्वक कराया जाता है, अकेले नहीं किया जाता।

यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।

*स्रोत — ग्रह-ध्यान के श्लोक व्यास-कृत नवग्रह स्तोत्र से; विधि और दान-क्रम पारम्परिक कर्मकाण्ड-पद्धति के अनुसार। किसी भी अनुष्ठान की तिथि और मुहूर्त अपने पंचांग से मिलाकर ही निश्चित कीजिए।*

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

नवग्रह का दान किस दिन करना चाहिए? +

हर ग्रह का अपना दिन है — सूर्य का रविवार, चन्द्र का सोमवार, मंगल का मंगलवार, बुध का बुधवार, बृहस्पति का गुरुवार, शुक्र का शुक्रवार, शनि और राहु का शनिवार, तथा केतु का मंगलवार या शनिवार।

क्या सभी ग्रहों का दान एक साथ कर सकते हैं? +

नवग्रह की सामूहिक शान्ति में ऐसा होता है, पर सामान्य रूप से हर ग्रह का दान उसके अपने दिन किया जाता है। और सबसे ज़रूरी बात — कुंडली देखे बिना किसी ग्रह का दान तय नहीं करना चाहिए।

दान किसे देना चाहिए? +

उसे, जिसे उस वस्तु की वास्तव में आवश्यकता है। शास्त्र में पात्र देखकर दान करने पर ज़ोर दिया गया है। दिखावे के लिए किया गया दान निष्फल कहा गया है।

क्या रत्न और दान साथ-साथ कर सकते हैं? +

सामान्यतः नहीं। किसी ग्रह का रत्न धारण करना उस ग्रह को बल देने के लिए होता है, और दान उसे शान्त करने के लिए। दोनों एक साथ उल्टी दिशा के काम हैं। यह कुंडली देखकर ही तय होता है।