AI Summary · लेख सार
महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का मंत्र है और शिव-उपासना में इसका स्थान सबसे ऊपर है। यह मंत्र रोग, भय और आयु से जुड़े विषयों में जपा जाता है। नीचे उसका मूल पाठ, अर्थ, जप की विधि, आसन और दिशा के नियम, माला, जप-संख्या और अनुष्ठान पूरा करने का दशांश-क्रम दिया गया है।
Key Takeaways · मुख्य बिंदु
- मंत्र ऋग्वेद का है — यह त्र्यम्बक मंत्र भी कहलाता है
- जप रुद्राक्ष की माला से, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके
- सवा लाख जप का अनुष्ठान प्रचलित है
- जप के बाद दशांश हवन का विधान है
- मंत्र आयु और आरोग्य के लिए है — किसी को हानि की भावना से जप वर्जित है
मूल मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
अर्थ
- त्र्यम्बकं — तीन नेत्रों वाले (शिव) की
- यजामहे — हम आराधना करते हैं
- सुगन्धिं — जो सुगन्ध से युक्त हैं, यानी कीर्ति से व्याप्त
- पुष्टिवर्धनम् — जो पोषण और बल को बढ़ाने वाले हैं
- उर्वारुकमिव बन्धनात् — जैसे पका हुआ खीरा अपनी बेल से सहज ही अलग हो जाता है
- मृत्योर्मुक्षीय — वैसे ही मुझे मृत्यु के बन्धन से मुक्त कीजिए
- मा अमृतात् — पर अमृत से, यानी जीवन-तत्त्व से अलग न कीजिए
यह अंतिम पंक्ति ध्यान देने योग्य है। प्रार्थना मृत्यु से बचने की नहीं — बन्धन से सहज मुक्ति की है, ठीक वैसे ही जैसे पका फल बिना झटके के डाल से छूट जाता है।
जप की विधि
- स्नान करके शुद्ध आसन पर बैठिए। ऊन या कुश का आसन उत्तम कहा गया है।
- पूर्व या उत्तर की ओर मुख रखिए।
- सामने शिवलिंग, शिव का चित्र या जल से भरा ताम्रपात्र रखिए।
- संकल्प कीजिए — अपना नाम, गोत्र और किस निमित्त जप कर रहे हैं।
- रुद्राक्ष की माला से जप कीजिए। माला की मेरु (सबसे बड़ा दाना) लाँघी नहीं जाती — वहाँ पहुँचकर माला घुमा दी जाती है।
- जप मन में या मंद स्वर में। जप के समय गिनती के अलावा मन कहीं और न जाए, इसी का अभ्यास करना है।
- जप के बाद जल को तुलसी या किसी पौधे में अर्पित कर दीजिए।
जप-संख्या
| उद्देश्य | संख्या |
|---|---|
| नित्य जप | 108 (एक माला) |
| लघु अनुष्ठान | 11,000 |
| पूर्ण अनुष्ठान | 1,25,000 (सवा लाख) |
जप पूरा होने पर उसका दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन, और उसका दशांश ब्राह्मण-भोजन — तब अनुष्ठान पूर्ण माना जाता है। इसीलिए सवा लाख का अनुष्ठान अकेले नहीं, विधिपूर्वक कराया जाता है।
नियम
- जप का समय, स्थान, आसन और माला — चारों एक ही रखिए। बदलते रहने से संख्या तो पूरी होती है, अनुष्ठान नहीं।
- जिस दिन आरम्भ किया, उस क्रम को बीच में तोड़ना नहीं चाहिए।
- मंत्र आयु और आरोग्य के लिए है। किसी के अहित की भावना से जप करना शास्त्र में वर्जित है।
- अशुद्धि के दिनों में जप स्थगित रखा जाता है; बाद में क्रम आगे बढ़ा दिया जाता है।
किस स्थिति में
यह मंत्र दीर्घ रोग, शल्य-क्रिया से पहले, दुर्घटना के भय, और कुंडली में आयु-भाव से जुड़े विषयों में जपा जाता है। पर यह ध्यान रहे — मंत्र चिकित्सा का स्थान नहीं लेता। रोग में योग्य चिकित्सक से उपचार अवश्य लीजिए; जप उसके साथ चलता है, उसकी जगह नहीं।
यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।
*स्रोत — मंत्र ऋग्वेद (7.59.12) तथा यजुर्वेद में आया है। जप-संख्या और दशांश-क्रम पारम्परिक कर्मकाण्ड-पद्धति के अनुसार। अनुष्ठान की तिथि अपने पंचांग से मिलाकर तय कीजिए।*
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आचार्य जी से परामर्श बुक करेंअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
महामृत्युंजय मंत्र का जप कितनी बार करना चाहिए? +
नित्य जप के लिए एक माला यानी 108 बार पर्याप्त माना गया है। लघु अनुष्ठान में 11,000 और पूर्ण अनुष्ठान में सवा लाख जप का विधान है। पूर्ण होने पर दशांश हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण-भोजन कराया जाता है।
महामृत्युंजय जप किस माला से करें? +
रुद्राक्ष की माला से। जप करते समय माला की मेरु, यानी सबसे बड़ा दाना, लाँघा नहीं जाता — वहाँ पहुँचकर माला घुमा ली जाती है।
जप के समय किस दिशा में मुख रखें? +
पूर्व या उत्तर की ओर। आसन ऊन या कुश का उत्तम कहा गया है। समय, स्थान, आसन और माला — चारों एक ही रखने से अनुष्ठान बनता है।
क्या महामृत्युंजय मंत्र दवा की जगह ले सकता है? +
नहीं। यह मंत्र आयु और आरोग्य के लिए है, पर चिकित्सा का स्थान नहीं लेता। रोग में योग्य चिकित्सक से उपचार अवश्य लेना चाहिए; जप उसके साथ चलता है।
ॐ