AI Summary · लेख सार
नए घर में पहली बार प्रवेश करते समय जो विधान किया जाता है, उसे गृह प्रवेश कहते हैं। नीचे उसकी पूरी विधि दी गई है — सामग्री, द्वार-पूजन, कलश लेकर प्रवेश का क्रम, वास्तु-पूजन और हवन, दूध उबालने की परम्परा, तथा वे बातें जो परम्परा में ध्यान रखी जाती हैं।
Key Takeaways · मुख्य बिंदु
- गृह प्रवेश के तीन प्रकार बताए गए हैं
- दाहिना पैर पहले रखने की परम्परा है
- कलश और नारियल लेकर गृहस्वामिनी आगे चलती हैं
- दूध उबालकर घर में फैलाने की रीति है
- तिथि और मुहूर्त पंचांग देखकर ही तय होता है
तीन प्रकार
शास्त्र में गृह प्रवेश के तीन प्रकार कहे गए हैं —
- अपूर्व — बिलकुल नए, पहली बार बने घर में प्रवेश
- सपूर्व — यात्रा या प्रवास के बाद अपने ही घर में लौटकर प्रवेश
- द्वन्द्व — अग्नि, जल या किसी विपत्ति के बाद मरम्मत कराकर प्रवेश
तीनों की विधि में थोड़ा अन्तर होता है।
सामग्री
- कलश — जल, आम के पत्ते, ऊपर नारियल, लाल वस्त्र
- गणेश जी की प्रतिमा, कुल-देवता का चित्र
- हवन-सामग्री, आम की लकड़ी, घी
- नवग्रह पूजन की सामग्री
- मौली, रोली, अक्षत, हल्दी, पुष्प
- दूध और चावल (खीर के लिए)
- गाय — जहाँ सम्भव हो, गौ-प्रवेश की परम्परा है
- आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार
विधि — क्रम से
- मुहूर्त पंचांग से निकलवाइए। गृह प्रवेश के लिए तिथि, नक्षत्र और मास — तीनों देखे जाते हैं।
- द्वार-पूजन — मुख्य द्वार पर हल्दी-कुमकुम से स्वस्तिक बनाइए, बंदनवार लगाइए, दोनों ओर कलश रखिए।
- जहाँ सम्भव हो, गाय को पहले प्रवेश कराइए।
- गृहस्वामिनी सिर पर कलश और हाथ में नारियल लेकर आगे चलें; गृहस्वामी पीछे।
- दाहिना पैर पहले रखकर प्रवेश कीजिए। साथ में शंख-ध्वनि या मंगल-गान।
- भीतर आकर उत्तर-पूर्व (ईशान) में गणेश-स्थापना और पूजन।
- वास्तु-पूजन — वास्तु पुरुष का पूजन और नवग्रह पूजन।
- हवन — आम की लकड़ी से, घी और हवन-सामग्री के साथ।
- दूध उबालना — रसोई में सबसे पहले दूध उबाला जाता है और उसे उफनने दिया जाता है। उफनकर बाहर फैलना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। उसी दूध से खीर बनाकर भोग लगाया जाता है।
- ब्राह्मण-भोजन और परिवार सहित भोजन।
ध्यान रखने की बातें
- घर पूरा बन चुका हो। द्वार, छत और रसोई अधूरी हो तो गृह प्रवेश का विधान नहीं है।
- प्रवेश के बाद पहले तीन दिन घर खाली नहीं छोड़ा जाता — परिवार का कोई सदस्य रहे।
- रसोई में पहला काम दूध उबालना ही होता है।
- घर में पहली रात्रि रुकने की परम्परा है।
- गर्भवती स्त्री और परिवार में हाल में शोक हुआ हो — इन स्थितियों में तिथि आगे बढ़ाने की परम्परा है।
मुहूर्त के विषय में
यह ध्यान रखिए — गृह प्रवेश का मुहूर्त किसी सामान्य सूची से नहीं लिया जाता। इसमें आपकी और परिवार की कुंडली, मास, तिथि, नक्षत्र और शुक्र-गुरु का अस्त होना — सब देखा जाता है। इसलिए मुहूर्त किसी योग्य व्यक्ति से ही निकलवाइए।
यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।
*स्रोत — गृह प्रवेश के तीन भेद और पूजा-क्रम पारम्परिक मुहूर्त एवं कर्मकाण्ड-पद्धति के अनुसार। मुहूर्त अपने पंचांग और योग्य परामर्श से ही तय कीजिए।*
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आचार्य जी से परामर्श बुक करेंअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गृह प्रवेश कितने प्रकार का होता है? +
तीन प्रकार का — अपूर्व (बिलकुल नए घर में पहली बार), सपूर्व (प्रवास के बाद अपने ही घर में लौटकर), और द्वन्द्व (किसी विपत्ति के बाद मरम्मत कराकर)। तीनों की विधि में थोड़ा अन्तर होता है।
गृह प्रवेश में घर में कौन पहले जाता है? +
जहाँ सम्भव हो, गाय को पहले प्रवेश कराया जाता है। उसके बाद गृहस्वामिनी सिर पर कलश और हाथ में नारियल लेकर आगे चलती हैं और गृहस्वामी पीछे। दाहिना पैर पहले रखकर प्रवेश किया जाता है।
गृह प्रवेश में दूध क्यों उबालते हैं? +
रसोई में पहला काम दूध उबालने का किया जाता है और उसे उफनने दिया जाता है। उफनकर बाहर फैलना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। उसी दूध से खीर बनाकर भोग लगाया जाता है।
क्या अधूरे घर में गृह प्रवेश कर सकते हैं? +
नहीं। परम्परा में कहा गया है कि द्वार, छत और रसोई अधूरी हो तो गृह प्रवेश का विधान नहीं है। घर पूरा बन जाने पर ही यह किया जाता है।
ॐ