AI Summary · लेख सार
किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में गणेश-पूजन का विधान है। नीचे उसकी पूरी विधि दी गई है — सामग्री, क्रम, दूर्वा चढ़ाने का नियम जो प्रायः ग़लत होता है, मोदक और लड्डू का विधान, मंत्र, तथा वे वस्तुएँ जो गणेश जी को नहीं चढ़तीं।
Key Takeaways · मुख्य बिंदु
- दूर्वा के जोड़े में 21 या 11 गाँठें चढ़ाई जाती हैं
- गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती
- मोदक और लड्डू उनका प्रिय भोग है
- वक्रतुण्ड महाकाय श्लोक सबसे प्रचलित है
- प्रत्येक शुभ कार्य के आरम्भ में गणेश-स्मरण का विधान है
सामग्री
- दूर्वा (दूब घास) — इस पूजा की मुख्य वस्तु
- लाल पुष्प, विशेषतः गुड़हल
- सिंदूर, अक्षत, चन्दन
- मोदक या बेसन/बूँदी के लड्डू
- धूप, दीप, कपूर
- पान, सुपारी, नारियल
विधि — क्रम से
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनिए। पूर्व या उत्तर की ओर मुख।
- चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कीजिए।
- दीपक जलाकर संकल्प कीजिए — किस निमित्त पूजा कर रहे हैं।
- जल से आचमन और स्नान। फिर पोंछकर आसन पर विराजमान कराइए।
- सिंदूर और चन्दन का तिलक लगाइए।
- दूर्वा अर्पित कीजिए — नीचे नियम दिया है।
- लाल पुष्प, अक्षत और वस्त्र चढ़ाइए।
- धूप-दीप दिखाइए।
- मोदक या लड्डू का भोग लगाइए।
- मंत्र-जप, फिर आरती। अंत में प्रसाद बाँटिए।
दूर्वा का नियम
यह गणेश-पूजा का विशेष अंग है और प्रायः ग़लत किया जाता है।
- दूर्वा की तीन या पाँच पत्तियों वाली डंडी ली जाती है।
- दो-दो डंडियों का जोड़ा बनाया जाता है — इसे एक "गाँठ" कहते हैं।
- ऐसी 21 गाँठें (या कम से कम 11) चढ़ाई जाती हैं।
- दूर्वा ताज़ी होनी चाहिए और मुरझाई हुई नहीं।
जो गणेश जी को नहीं चढ़ता
| वस्तु | कारण (परम्परा में) |
|---|---|
| तुलसी | पुराण की कथा के अनुसार इसका निषेध कहा गया है |
| टूटे या सूखे अक्षत | अक्षत का अर्थ ही है — जो टूटा न हो |
| मुरझाए पुष्प | किसी भी देव-पूजा में वर्जित |
मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
अर्थ — हे वक्र सूँड़ वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति वाले देव! मेरे सब कार्यों में सदा निर्विघ्नता कीजिए।
अन्य मंत्र —
- ॐ गं गणपतये नमः
- ॐ श्री गणेशाय नमः
कब-कब
- बुधवार गणेश जी का दिन माना जाता है।
- चतुर्थी तिथि उनकी तिथि है; संकष्टी और विनायक चतुर्थी विशेष।
- किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में — गृह प्रवेश, विवाह, नया कार्य — गणेश-पूजन पहले होता है। शास्त्र में यही क्रम है।
ध्यान की बातें
- पूजा में प्रतिमा की सूँड़ किस ओर मुड़ी है, इसे लेकर अलग-अलग परम्पराएँ हैं। घर की नित्य पूजा के लिए बाईं ओर मुड़ी सूँड़ वाली प्रतिमा सुलभ मानी जाती है।
- एक घर में गणेश जी की बहुत-सी प्रतिमाएँ रखने की परम्परा नहीं है।
- प्रसाद अर्पित करने के बाद बाँटिए।
यह लेख शास्त्र और परम्परा की जानकारी देने के लिए है। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी कुंडली दिखाकर परामर्श ले लेना उचित रहता है, क्योंकि एक ही उपाय हर कुंडली पर एक जैसा लागू नहीं होता।
*स्रोत — दूर्वा का विधान, निषिद्ध वस्तुएँ और पूजा-क्रम पारम्परिक कर्मकाण्ड-पद्धति के अनुसार। तिथि अपने पंचांग से मिलाकर तय कीजिए।*
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आचार्य जी से परामर्श बुक करेंअक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गणेश जी को दूर्वा कैसे चढ़ाते हैं? +
तीन या पाँच पत्तियों वाली दो डंडियों का जोड़ा बनाकर, ऐसी 21 गाँठें — या कम से कम 11 — अर्पित की जाती हैं। दूर्वा ताज़ी होनी चाहिए।
क्या गणेश जी को तुलसी चढ़ाई जाती है? +
नहीं। पुराण की कथा के अनुसार गणेश जी को तुलसी अर्पित करने का निषेध कहा गया है।
गणेश पूजा किस दिन करनी चाहिए? +
बुधवार उनका दिन माना जाता है और चतुर्थी उनकी तिथि। इसके अलावा किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में गणेश-पूजन पहले किया जाता है।
गणेश जी को क्या भोग लगाएँ? +
मोदक उनका सबसे प्रिय भोग कहा गया है। बेसन या बूँदी के लड्डू भी प्रचलित हैं। भोग लगाने के बाद प्रसाद बाँट देना चाहिए।
ॐ